Sri Lanka Crisis: सिंहासन खाली करो कि जनता आती है…

दुनिया फीचर

अजय भट्टाचार्य
देश
की दक्षिणी जल सीमा से सटे पड़ोसी द्वीप राष्ट्र श्रीलंका में गृहयुद्ध जैसे आसार हैं। 11 मई को तत्कालीन प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के पूरे परिवार के साथ भागने के बाद उनके छोटे भाई व देश के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे भी सत्ता विरोधी प्रदर्शन के बाद अपना सरकारी आवास छोड़ चुके हैं। यह स्तंभ लिखे जाने तक प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने भी पद से इस्तीफ़ा दे दिया है ताकि मौजूदा संकट का हल निकालने के लिए एक सर्दालीय सरकार बनाई जा सके। खुद राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे की पार्टी श्रीलंका पोदुजाना पेरामुना के सोलह सांसदों ने राष्ट्रपति के तत्काल इस्तीफे का अनुरोध किया है। प्रदर्शनकारियों द्वारा राजपक्षे के आधिकारिक आवास में घुसने के बाद द्वीप राष्ट्र में संकट और गहरा गया है। राष्ट्रपति को शुक्रवार की रात सेना मुख्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया। श्रीलंका की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। वहां सभी स्कूल 15 जुलाई तक बंद कर दिए गए हैं। सरकार ने कम से कम चार राज्य विश्वविद्यालयों को भी, देश की आर्थिक स्थिति ध्वस्त हो जाने के कारण बंद कर दिया है।
सवाल यह उठता है कि श्रीलंका में यह हालात क्यों बने? जिस राजपक्षे परिवार को देश की जनता ने हाथों हाथ लिया और सत्ता के शीर्ष पर बिठा दिया, ऐसा क्या हुआ कि वही जनता उनसे कह रही है, ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।‘ श्रीलंका के मामलों पर नजर रखने वाले कूटनीतिज्ञों का मानना है कि धर्म की राजनीति ने आज श्रीलंका को इस स्थिति पर लाकर खड़ा किया है। 2013 में महिंदा राजपक्षे ने अल जज़ीरा के एक साक्षात्कार में क्या वो श्रीलंका में राजपक्षे परिवार के शासन का निर्माण कर रहे हैं पर जवाब में कहा था, “ये लोगों पर निर्भर है, लोग (राजपक्षों) को चुन रहे हैं। मैं इसके बारे में क्या कर सकता हूं? जब वे उन्हें नहीं चाहेंगे, तो बाहर निकाल देंगे, सभी राजपक्षों को बाहर कर दिया जाएगा।” । इसके ठीक नौ साल बाद श्रीलंका के लोगों ने राजपक्षे परिवार को सत्ता से नीचे उतार दिया है। गोटबाया 1991 में सेना की नौकरी से रिटायर होने के बाद अमेरिका में जाकर बस गए थे। 2005 में महिंद्रा राजपक्षे ने अपने छोटे भाई गोटबाया को चुनाव में मदद के लिए वापस बुलाया। वे लौटे भाई की मदद की। महिंद्रा चुनाव जीत गए। जिसके बाद महिंद्रा ने गोटबाया से कहा वापस कहां जाओगे। यहीं रूको और मेरी मदद करो। महिंद्रा ने गोटबाया को रक्षा मंत्री बना दिया। इस काल में श्रीलंका में गृहयुद्ध चरम पर था। सेना में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम के खिलाफ मोर्चा तेज कर दिया था। गोटबाया ने 2005-2015 के दौरान बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति रहने के दौरान डिफेंस रक्षा मंत्री रहते हुए तमिल अलगाववादियों यानी लिट्टे को क्रूरता से कुचल दिया था। बहुसंख्यक सिंहली बौद्ध उन्हें अपना नायक मानते थे। 2009 में सेना ने पूर्ण विजय का ऐलान कर दिया। इस दौरान हजारों की संख्या में तमिलों को मारा गया। बड़ी संख्या में लोगों को मारा गया। जांच की मांग भी उठी। लेकिन राजपक्षे बंधुओं ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। 2019 में गोटबाया राजपक्षे राष्ट्रपति बन गए। राजपक्षे परिवार ने जिस सिंहली राष्ट्रवाद के नाम पर अपने देश की जनता को उन्माद के नशे में रखा, उसका नशा उतरते ही उसी सिंहली जनता ने दोनों भाइयों को पद छोड़कर भागने के लिए मजबूर कर दिया। इस विंदु पर भारत के प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके प्रो. कौशिक बसु की बात पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है। उन्होंने कहा था, ‘दुनिया के 109 मुल्क़ धर्म की राजनीति से बरबाद हो चुके है..मुझे फ़िक्र है कि भारत धर्म से बरबाद होने वाला 110वां देश ना बन जाए।‘ आज श्रीलंका के बादशाह का तख़्त उछाला जा चुका है। बादशाह फ़रार है। “सिंहली राष्ट्र” बनाने का दावा करने वाला आज ख़ुद की जान की भीख मांग रहा है। दरबदर भटक रहा है और हम देख रहे है, शायद हम आगे भी देखेंगे। श्रीलंका की वर्तमान स्थिति एक चेतावनी है जो धर्म की राजनीति के चलते म्यांमार के बाद दूसरा पड़ोसी देश है जो बर्बादी की कगार पर आ खड़ा हुआ है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.