लोकतंत्र को पुलिस राज्य बनने से रोको

समाचार

अजय भट्टाचार्य
असम
के बारपेटा सत्र न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अपरेश चक्रवर्ती ने गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी को महिला पुलिसकर्मी पर हमले के मामले में जमानत देते हुए अपने आदेश में कहा है कि, “हमारे मेहनत से अर्जित लोकतंत्र को पुलिस राज्य में बदलना अकल्पनीय है। अगर तत्काल मामले को सच मान लिया जाता है और मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज महिला के बयान के मद्देनजर … जो नहीं है, तो हमें देश के आपराधिक न्यायशास्त्र को फिर से लिखना होगा। एफआई आर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) के विपरीत, महिला कॉन्स्टेबल ने विद्वान मजिस्ट्रेट के सामने एक अलग कहानी बताई है… महिला की गवाही को देखते हुए ऐसा लगता है कि आरोपी जिग्नेश मेवाणी को लंबी अवधि के लिए हिरासत में रखने के उद्देश्य से तत्काल मामला बनाया गया है। यह अदालत की प्रक्रिया और कानून का दुरुपयोग है।”
सत्र न्यायालय की इस टिप्पणी से जाहिर है कि असम पुलिस ने पहले मामले में जमानत मिलने के बाद जिग्नेश मेवाणी को फिर से गिरफ्तार करने का षड्यंत्र जल्दबाजी में रचा और एक महिला कांस्टेबल पर हमले आ आरोप लगाकर उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया। अदालत ने इस “बनाये मामले” में फंसाने की कोशिश करने के लिए राज्य पुलिस की कड़ी आलोचना की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ट्वीट के मामले में असम की एक अन्य अदालत द्वारा जमानत दिए जाने के तुरंत बाद 25 अप्रैल को असम पुलिस ने एक महिला कांस्टेबल पर “कथित” हमले के मामले में जिग्नेश को गिरफ्तार कर लिया था। उस मामले में असम के बारपेटा की अदालत ने उन्हें जमानत देते हुए शुक्रवार को यह टिप्पणी की। इतना ही नहीं, बारपेटा सत्र न्यायालय ने मेवाणी को जमानत देने के अपने आदेश में गुवाहाटी उच्च न्यायलय से राज्य में हाल के दिनों में पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ एक याचिका पर विचार करने का भी अनुरोध किया है।
सत्र अदालत ने गुवाहाटी हाईकोर्ट से यह भी आग्रह किया है कि वह असम पुलिस को बॉडी कैमरा पहनने और अपने वाहनों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दे ताकि किसी आरोपी को हिरासत में लिए जाने पर घटनाओं के क्रम को रिकॉर्ड किया जा सके। जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ ”झूठी प्राथमिकी” दर्ज कराने को लेकर असम पुलिस को राज्य की अदालत की फटकार लगने के बाद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा क्या सीबीआई को यह पता लगाने की जिम्मेदारी देंगे कि किस ”सनकी व्यक्ति” ने मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई।
अदालत ने पाया कि कोई भी समझदार व्यक्ति दो पुरुष पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में एक महिला पुलिस अधिकारी का शील भंग करने की हिम्मत नहीं कर सकता और प्राथमिकी का कोई आधार नहीं है। अदालत ने पाया कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मेवाणी एक पागल व्यक्ति हैं। यदि मेवाणी पागल नहीं हैं और फिर भी उनके खिलाफ झूठी प्राथमिकी दर्ज की गई थी, तो कोई तो पागल हुआ? उह पागल कौन है असम के मुख्यमंत्री को यह पता लगाने के लिए मामला सीबीआई को देना चाहिये कि मेवाणी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने वाला पागल व्यक्ति कौन था? मेवाणी को पुलिस दल द्वारा गुवाहाटी से कोकराझार ले जाए जाने के दौरान महिला पुलिस अधिकारी पर ”हमला” करने के आरोप में सोमवार को गिरफ्तार किया गया था। इससे पहले असम की कोकराझार पुलिस के एक दल ने कांग्रेस समर्थित निर्दलीय विधायक मेवाणी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कथित रूप से किए गए एक ट्वीट के लिए गुजरात से पकड़कर गिरफ्तार कर लिया था। जनतंत्र को पुलिस तन्त्र में बदलने की यह पहली कोशिश नहीं है। पंजाब पुलिस भी यही काम कुमार विश्वास को पकड़ने के लिए कर चुकी है। राजनीति में वैचारिक विरोधियों को डंडे के दम पर दबाने का अभियान विभिन्न रूपों में नजर आ रहा है। इस नई विधा में बुलडोजर भी एक माध्यम बनकर उभरा है। यह प्रवृत्ति आरंभिक तौर पर भली लग सकती है परन्तु इसके दूरगामी परिणाम देश और लोकतंत्र के लिए घातक ही सिद्ध होंगे।

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