मक्का के सरदारों ने की जान लेने की साजिश, नबी को छोड़ना पड़ा वतन

इस्लाम के पन्ने से

मुसलमानों की हिजरत मक्का से मदीना इतनी सरल न थी कि वह आसानी से सहन कर लेते। मुशरकीन ने हर प्रकार की रुकावटें मुसलमानों के लिए खड़ी कर दीं और हर तरह की परीक्षा में उनको डाल दिया। लेकिन मुहाजिरीन अपनी बात के धनी थे । और जो इरादा कर लिया था उससे पीछे हटने वाले नहीं थे । वह पूरी तरह मक्का को छोड़ने को तैयार थे । उनमें से जो कुछ ऐसे भी थे जिनको अपने परिवार छोड़कर मक्का से जाना पड़ा जैसे कि अबू सालिमा के साथ पेश आया । कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने वह सब कुछ मक्का में ही छोड़ दिया था जो वहाँ रहकर अपनी जिन्दगी में कमाया जैसे सुहैब ने किया । हजरत उमर बिन खत्ताब , तलहा , हमजा , यजीद बिन हारिस , अब्दुर्रमान बिन औफ , जुबैर बिन अव्वाम , अबू हुज़ेफा , उसमान बिन अफ्फान और दूसरे सहाबा ने मदीना हिजरत की । हज़रत अबूबकर और हज़रत अली को छोड़कर सबने हिजरत के लिए मदीने की यात्रा की । वह रह गये जो किसी परेशानी या परीक्षा में पड़ गये थे ।

जब कुरैश को यह सूचना मिली कि रसूलुल्लाह ( सल्ललाहु अलैहि व सल्लम ) के बहुत से हमदर्द व सहयोगी मदीने में तैयार हो गये हैं और वहाँ उनका कोई जोर नहीं चल सकता तो कुरैश को आप ( सल्ललाहु अलैहि व सल्लम ) की हिजरत का भय हुआ । वह यह भली प्रकार जान गये कि यदि रसूलुल्लाह यहाँ से तशरीफ ले गये तो फिर उन पर उनका कोई जोर नहीं चलेगा । यह सोचकर वह सब दारुननदवा में जमा हो गये जो वास्तव में कुसई बिन किलाब का घर था । कुरैश अपने महत्वपूर्ण मामले और कार्यों को यहीं निपटाते और निर्णय लेते और आगे क्या करना है इसकी योजना बनाते थे । इसमें कुरैश के सब सरदार शरीक होते। दारूननदवा में सबने मिलकर यह तय कर लिया कि प्रत्येक कबीले से एक एक युवक का चयन हो । सब मिलकर एक साथ आप पर हमला कर दें । इस प्रकार इस जुर्म में सब बराबर के शरीक होंगे । बनी अबदे मुनाफ सारी कौम से जंग का खतरा मोल न लेंगे । कौम आप पर हमला करने की योजना बनाकर अलग हो गयी । इसकी योजना की सूचना अल्लाह ने हुजूर को दे दी । आपने हज़रत अली को अपनी चादर ओढ़ा कर अपने स्थान पर सो जाने को कहा और हज़रत अली से फरमाया कि तुम्हें कोई कष्ट न होगा ।

हुजूर और हज़रत अबूबकर छिपते छिपाते मक्का से निकले । हज़रत अबूबकर ने अपने सुपुत्र अब्दुल्लाह बिन अबूबक्र को यह आदेश दिया कि वह सभी खबरें उन तक पहुंचाया करें जो मक्का वाले उनके बारे में कहें । अपने गुलाम आमिर बिन फुहेरा को निर्देशित किया कि वह दिन में बकरियां चराये और शाम को उनका दूध उन तक पहुंचाये । हज़रत असमा को खाना पहुँचाने का कार्य सौंपा । जब दोनों गारे सौर तक पहुंचे तो हज़रत अबूबकर ग़ार में गये । यह देखने के लिए कि उसमें कोई कीड़ा न हो जो आपको तकलीफ पहुँचाये और वह आपके आने के पूर्व साफ हों । जब दोनों गारे सौर में दाखिल हुए तो अल्लाह ने मकड़ी को भेजा जिसने ग़ार से उस पेड़ तक जाला तान दिया जो ग़ारे के मुँह पर था । और रसूलुल्लाह और हज़रत अबूबक्र को छिपा दिया । उसके बाद अल्लाह ने 2 जंगली कबूतरियों को आदेश दिया वह फड़ फड़ाती रहें । फिर मकड़ी और दरख्त के बीच आकर बैठ गयीं । ” व लिल्लाहे जुनदुस् समावाति वल अर्जि ।” और अल्लाह ही के हैं आकाश और धरती के लश्कर।

इधर मुशरकीन ने आप का पीछा किया और पहाड़ तक पहुँच गये पहाड़ पर चढ़े और ग़ार के मुँह तक आ गये । गार के मुँह पर मकड़ी का जाला तना मिला वह कहने लगे कि यदि वह ग़ार में होते तो गार के मुँह पर मकड़ी का जाला तना न मिलता। “ला तहजन इन्नल लाह मअना” जब वह दोनों ग़ार में थे कि हज़रत अबूबकर को मुशरकीन के निशान दिखे वह कहने लगे कि ऐ अल्लाह के रसूल इनमें से एक भी यदि अपने कदमों को आगे बढ़ाये तो हम लोगों को देख लेगा । आपने फरमाया कि तुम्हारा क्या खयाल है ? उन दो के बारे में जिनका तीसरा खुदा है। इसी मौके पर यह आयत उतरी। अनुवाद – उस समय दो ही व्यक्ति थे जिनमें एक अबूबक्र थे दूसरे स्वयं रसूलुल्लाह । जब दोनों गार ( सौर ) में थे उस समय आप अपने रफीक को तसल्ली देते थे कि ग़म न करो अल्लाह हमारे साथ है।

कुरैश ने जब रसूलुल्लाह को नहीं पाया तो यह एलान कर दिया कि जो भी रसूल ( सल्ललाहु अलैहि व सल्लम ) को लायेगा उसको 100 ऊँट पुरस्कार के तौर पर दिये जायेंगे । आप दोनों ने गारे सौर में तीन रातें बिताई फिर वहाँ से निकले । साथ में उनके आमिर बिन फुहेरा थे। उन्हें मार्ग दिखाने के लिए मुलाजिम रखा गया था । वह साहिल के किनारे किनारे चल पड़े ।

सुराका बिन मालिक बिन जुअराम ने आपको पकड़ने और आपको कुरैश के हवाले करने का बीड़ा उठाया ताकि 100 ऊँट प्राप्त कर सके। अपने घोड़े पर सवार होकर आपके कदमों के निशान की सहायता से आपका पीछा किया लेकिन उसके घोड़े को ठोकर लगी और वह उससे गिर गया लेकिन पीछा करने से बाज नहीं आया । वह फिर घोड़े पर सवार हुआ और निशानों की मदद से पीछा करने लगा। उसके घोड़े को फिर ठोकर लगी और वह फिर गिर पड़ा। वह सवार हुआ फिर पीछा करने लगा कि ये लोग उसको नजर आ गये। उसी समय उसके घोड़े ने तीसरी मरतबा ठोकर खाई। उसके दोनों अगले पांव जमीन में धंस गये। सुराका गिर पड़ा उसके साथ बगोले के समान धुआं भी उठा।

सुराका ने जब यह कैफियत देखी तो समझ गया कि रसूल ( सल्ललाहु अलैहि व सल्लम ) को इस समय अल्लाह की मदद व सहायता मिल रही है । यह हर प्रकार सफल होंगे तो उसने जोर से पुकारा और कहा कि मैं सुराक बिन जअशम हूँ। मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ खुदा की कसम मुझसे आपको कोई हानि नहीं पहुँचेगी। तब आपने अबू बक्र से फरमाया कि उससे पूछो कि वह चाहता क्या है ? सुराका ने उत्तर दिया कि आप हमें एक तहरीर दे दें ( निशानी के तौर पर ) जो हमारे और आपके बीच यादगार हो। आमिर बिन फुहेरा ने हड्डी पर एक तहरीर लिख कर दे दी। किसरा के कंगन सुराका के हाथ में आपने सुराका से फरमाया कि तुम्हारी कैफियत उस समय क्या होगी जब तुम्हें किसरा के कंगन पहना दिये जायेंगे । हज़रत उमर की खिलाफत ( समय ) में आपकी यह भविष्यवाणी सत्य हुई जब हज़रत उमर ने सुराका को बुलाया और कंगन उनको पहनाये।

प्रस्तुतकर्ता – रईस खान
क़ौमी फरमान, मुंबई

किताब- अंतिम नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम, नबियों के किस्से

लेखक- सय्यद अबुल हसन अली मियां नदवी

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