नबी स० का नूर चमका और छा गया सारे जहान में

इस्लाम के पन्ने से

हज़रत इब्ने अब्बास रिवायत फरमाते हैं : ” जब नूरे मुहम्मदी स० हज़रत अब्दुल्लाह से मुन्तकिल होकर हज़रत आमना के शिकम में करार पज़ीर हुआ तो कुरैश के तमाम जानवरों को कुवते गोयाई मिल गई और वह बाहम ये मुजदा सुना रहे थे कि मुहम्मद स० माँ के पेट में मुन्तकिल हो गये । काबुल अहबार की रिवायत है कि उस राते बिसाते अर्ज के कनारों से लेकर आसमान की तनाबों तक ये सदाए गूँज उठी थी कि नूरे मुहम्मदी शिकमे मादर में मुन्तकिल हो गया । ऐ आमना ! मुबारक हो । इन दिनों कुरैश सख़्त कहत के दौर से गुज़र रहे थे , नाने शबीना तक के लाले पड़े हुए थे , यकायक खेतियाँ हरी भरी हो गई , दरख़्तों पर फलों की बहार आ गई , कबील – ए – कुरैश के पास हर तरफ से तोहफे और नज़राने आने लगे । नूरे मुहम्मदी की बरकत से ये साल तारीख़ में फरहत व खुशहाली के नाम से याद किया जाता है ।

हज़रत आमना के अय्यामे हमल की कैफियत भी आम ख़वातीन से बिल्कुल मुनफ़रिद थी । आप खुद फरमाती हैं मुझे पता ही नहीं चला कि मैं हामला हो गई हूँ । न मुझे कोई बोझ महसूस हुआ , जो इन हालात में दूसरी औरतों को महसूस होता है , मुझे सिर्फ इतना मालूम हुआ कि मेरे अय्यामे माहवारी बन्द हो गये हैं । एक रोज़ मैं ख़्वाब और बेदारी के बैन – बैन थी कि कोई आने वाला मेरे पास आया और उसने पूछाः ऐ आमना ! क्या तुम्हें अपने हामला होने का इल्म है ? मैंने जवाब दिया : नहीं । फिर उसने बताया कि तुम हामला हो और तुम्हारे बतन में इस वक्त उम्मत का सरदार और नबी तशरीफ फरमा हैं । ( अलवफा , इब्ने जौजी जि -1 पे -88 )

इब्ने इस्हाक़ अपनी सीरत में हज़रत आमना रजि ० से ये रिवायत करते हैं कि ” हमल करार पाने के बाद एक गैबी आवाज़ मेरे कानों में आई , ऐ आमना ! तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे हमल में कौन सी शखसियत है ? ये नबी आखिरुज्जमा हैं । जब वजए हमल हो तो उस वक़्त ये दुआ करना : ” अईजुहू बिलवाहिदी मिन शर्रि कुल्लि हासिदिन ” और इस माहताबे नुबुव्वत का नाम मुहम्मद रखना।

हज़रत आमना फरमाती हैं कि दौराने हमल मैंने देखा कि एक नूर मेरे जिस्म से निकला जो सारे आलम को मुहीत हो गया और इसके बाद एक नूरी शुआ फूटी जिसकी रौशनी में मुल्के शाम का शहर बसरा नज़र आने लगा । अब वह दिल अफ़रोज़ साअत करीब आने वाली है जिसका इन्तेज़ार सदियों से था । रबीउन्नूर का बहारअफ़ज़ा महीना शुरु हो चुका था ।

देखते ही देखते 12 रबीउल अव्वल दोशम्बे का दिन आ गया । आहिस्ता – आहिस्ता शब की सियाही छटने लगी । अब सुबहे सादिक की वह पुरनूर घड़ी आ गई , जब जवाँसाल बेवा हज़रत आमना के हसरत व यास में डूबे हुए मकान में अजली सआदतों और अबदी मुसर्रतों से नूर चमका । ये यतीम दुर्रे यतीम था , मगर यतीमों का मावा व मल्जा बनकर आया था । ये हिरमाँ नसीबों के लिए उम्मीद की किरन बनकर नमूदार हुआ था , ये सदियोंसे जुल्मो सितम की चक्की में पिसी हुई इन्सानियत के लिए मुजद – ए – जाँफेजा बन कर आया था। ये सनमपरस्ती के अहद में खुदापरस्ती का पैग़ाम बनकर आया था , ये सितमरानियों के दौर में रहमते दो आलम बन कर आया था

जिस सुहानी घड़ी चमका तैबा का चाँद उस दिल अफरोज साअत पे लाखों सलाम

सीरत इब्ने इस्हाक़ की ये रिवायत आज भी आँखों को नूर और दिलों को करार पहुँचाती है । हज़रत आमना फरमाती हैं । ” जिस शब मुहम्मद की विलादते बासआदत हुई , मैंने देखा कि आसमान के सितारे बारिश की तरह मुझ पर बरसने वाले हैं और नबी – ए – पाक के चेहर – ए – जेबा के मुश्ताक हैं। आप फरमाती है . ” जब सैय्यदे आलम जमीन पर तशरीफ लाये , आपने सरे मुबारक उठाया और आसमान की जानिब रुख करके दस्त बदुआ हो गये । ” फरमाती हैं ” शबे विलादत ऐवाने किसरा के चौदह कंगरे गिर गये , पारसियों के आतिशकदे की वह आग बुझ गयी जो एक हजार साल से मुसलसल जल रही थी । “

हज़रत अब्दुल मुत्तलिब फरमाते हैं : मैं उस वक्त काबा में था , मैंने बुतों को देखा । कि सब बुत अपनी – अपनी जगह सरबसुजूद हो गये , सर के बल गिर पड़े और दीवारे काबा से ये आवाज़ आ रही है : ” मुस्तफा और मुख़्तार पैदा हुआ , उसके हाथ से कुफ्फार हलाक होंगे और काबा बुतों की इबादत से पाक होगा , वह अल्लाह की इबादत का हुक्म देगा जो हकीकी बादशाह है और सब कुछ जानने वाला है ।

हज़रत शेख इस्माईल नबहानी खतीब बग़दादी से रिवायत करते हैं कि हज़रत आमना ने फरमायाः ” जब आप स० की विलादत हुई , मैंने एक बड़ा सा बादल देखा जिसकी चमक में मैंने घोड़ों की हिनहिनाहट , पर्दों की सरसराहट और इन्सानों की सी गुफ्तगू सुनी । फिर एक मुनादी ने ये निदा की कि मुहम्मद को तमाम दुनिया की सैर कराओ , जिन्नों , इन्सानों के मुक़द्दस अफराद और फ़रिश्तों , परिन्दों और वह्शी जानवरों से रोशनास कराओ और आपको हज़रत आदम का खल्क , हज़रत नूह की शुजाअत , हज़रत इब्राहीम की ख़ल्लत , हज़रत इस्माईल की ज़बान , हज़रत इस्हाक़ की रज़ा , हज़रत सालेह की फ़साहत , हज़रत लूत की हिकमत , हज़रत याकूब की बशारत , हज़रत मूसा की सख़्ती , हज़रत अय्यूब का सब्र , हज़रत यूनुस की ताअत , हज़रत यूशअ का जेहाद , हज़रत दाऊद की सियानत , हज़रत दानियाल की मुहब्बत , हज़रत इलयास की वफ़ा , हज़रत यह्या की परहेज़गारी , हज़रत मूसा का ज़ोहद अता कर दो और अम्बियाके अखलाक से सजा दो । “

इसी के बाद अनवारे मुहम्मदिया में ये रिवायत भी है कि कोई घर ऐसा न था जो रौशन न हुआ हो , कोई मकान ऐसा न था जिसमें नूरे मुहम्मदी स ० का जुहूर न हुआ हो । और कोई जानवर ऐसा न था जो बोल न उठा हो । शैख अहमद ज़ैनी दहलान की ” अस्सीरतुन नबविय्यह ” के हवाले से ” ज़ियाउन्नबी ” में है : ” हज़रत आयशा रजि ० से मरवी है , आप उन लोगों से रिवायत करती हैं जो विलादते बा सआदत के वक़्त मौजूद थे । आपने कहा, मक्का में एक यहूदी सुकूनत पज़ीर था । जब वह रात | आई जिसमें अल्लाह के प्यारे रसूल स ० की विलादते बासआदत हुई , तो उस यहूदी ने कुरैश की एक महफिल में जाकर पूछा, ऐ कुरैश ! क्या तुम्हारे यहाँ कोई बच्चा पैदा हुआ है ? कौम ने अपनी बेख़बरी का इज़हार किया । उस यहूदी ने कहा, मेरी बात ख़ूब याद कर लो , इस रात इस आखिरी उम्मत का नबी पैदा हुआ है और ऐ कुरैश ! वह तुम्हारे क़बीले में से होगा और उसके कन्धे पर एक जगह बालों का गुच्छा होगा ।

लोग ये सुनकर अपने – अपने घरों को चले गये । हर शख्स ने अपने अहलेखाना से पूछा , उन्हें बताया गया कि आज रात अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब के यहाँ एक फ़रजन्द पैदा हुआ है । जिसे मुहम्मद से के बाबरकत नाम से मौसूम किया गया है । लोगों ने यहूदी से आकर बताया । उसने कहा , मुझे ले चलो और उस नौमौलूद बच्चे की ज़ियारत कराओ । वह उसे लेकर हज़रत आमना के हरीमे नूर आए । उन्होंने हज़रत आमना से कहा , हमें अपना फरजन्द दिखाओ । वह अपने लख्ते जिगर को । उठाकर उनके पास ले आई , उन्होंने इस बच्चे की पुश्त से कपड़ा हटाया तो पुश्त पर बालों का गुच्छा देखकर वह यहूदी गश खाकर गिर पड़ा । जब उसे होश आया तो लोगों ने पूछा , तुम्हें क्या हो गया । था । उसने बसदे हसरत कहा कि बनीइस्राईल से नबुव्वत ख़त्म हुई । ऐ कबील – ए – कुरैश ! तुम खुशियाँ मनाओ , इस नौमौलूद मसऊद की बरकत से मशरिक व मगरिब में तुम्हारी अज़मत का डंका बजेगा । ( मुलख्खसन अजः जियाउन्नबी , जि -2 पे -32 ) ,

जब नूर बरसाता हुआ आफ़ताबे कुस तुलू हुआ तो कायनात की हर चीज़ मुसर्रतों के शादियाने बजा रही थी , अर्श व फर्श में चरागाँ था । हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ की वालिदा अश्शिफा कहती हैं : ” उस नूरे मुजस्सम के ज़ाहिर होने से मेरे सामने मशरिक व मगरिब में रौशनी फैल गई । यहाँ तक कि मैंने शाम के बाज़ मोहल्लात को देखा । कहकशां बिसाते हरम के बोसे ले रही थी । हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ये हैरतअंगेज़ मनाज़िर देखकर पुकार उठे ” मेरा ये बच्चा बड़ी शान व शौकत वाला होगा ‘। ये नूर व सुरूर का आलम फर्शे ज़मीन पर ही नहीं था बल्कि अफ़लाके पर फ़रिश्ते भी आलमे मुसर्ररत में सुजूदे शुक्र अदा कर रहे थे , मगर इस भरी कायनात में एक था जो नाक भौं चढ़ाकर बैठा था । अपनी बदबख़्ती और हिरमां नसीबी पर अश्क बहा रहा था वह जात वाला खुराफात इब्लीस मलऊन की थी ।

रौजुल अन्फ में हज़रत कासिम सुहैली लिखते हैं : ” इब्लीस मलऊन ज़िन्दगी में चार बार चीख़ मारकर रोया । पहली बार जब उसको मलऊन करार दिया गया , दूसरी बार जब उसे बुलन्दी से पस्ती की तरफ धकेला गया , तीसरी बार जब सरकारे दो आलम की विलादते बासआदत हुई , चौथी बार जब सूरए फातेहा नाज़िल हुई । ” ( बहवाला जियाउन्नबी , जि -3 पे -56 )

मुस्तफा जाने रहमत की जलवागरी बनी नौए इन्सान पर एहसाने अज़ीम है । और उम्मते मुस्लिमा के लिए तो इससे बड़ी कोई नेअमत है ही नहीं । इरशादे बारी ताला है : ” यकीनन बड़ा एहसान फरमाया | अल्लाह तआला ने मोमिनों पर जब उसने भेजा उनमें एक रसूल उन्हीं में से । ” ( आले इमरान – 164 )

अगर आपने कुरआने अज़ीम को माना है तो इस हक़ीक़त को भी तसलीम करना होगा कि रसूले करीम की जलवागरी हमारे लिए अल्लाह की सबसे अज़ीम नेअमत व रहमत है और इस नेअमत से मुसलसल फैज़ व बरकत के लिए ज़रूरी है कि उसकी नेअमत व रहमत का शुक्र अदा किया जाए । ये फ़लसफ़ – ए – शुक्र व नेअमत भी हमें कुरआन ही से मिला है । इरशादे रब्बानी है : ” और याद करो जब मुत्तला फरमाया तुम्हारे रब ने कि अगर साबिका एहसानात पर शुक्र अदा करोगे तो मैं मज़ीद इज़ाफा करूँगा और तुम ने नाशुक्री की तो यकीनन मेरा अज़ाब शदीद होगा । “

ये एक फितरी बात है , जब किसी को कोई इन्आम दिया जाता है तो उसका दिल फर्ते मसर्रत से झूम उठता है । इन्आम जितना अज़ीम होगा फरहत व इन्बेसात का आलम भी उतना ही दोबाला होगा । या यूँ समझिये कि इन्आम पाने वाले के दिल में इन्आम व एकराम की जितनी कद्रोकीमत होगी , इन्बेसात के जज़्बात की कैफियत भी उसी कद्र फुजूँतर होगी । इज़हारे मुसर्रत । अल्लाह तआला फरमाता है : ” ऐ हबीब ! आप फरमाइये , अल्लाह का फज़ल और उसकी रहमत पर चाहिए कि उस पर खुशी मनाएं , ये बेहतर है उन चीज़ों से जिनको वह जमा करते हैं । ” ( सूर – ए – यूनुस -58 )

कुरआने अज़ीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है : ” अपने रब की नेअमत का खूब – खूब चर्चा करो । ” ( सूर – ए – वज्जुहा- 11 )

अब ये फैसला आपको करना है कि शरई हदबन्दियों के साथ इज़हारे मसर्रत कैसे किया जाए , मगर इतना तो सबके नज़दीक मुसल्लम है कि मुसर्रतों का इज़हार चिरागों को बुझाकर नहीं बल्कि चरागां करके किया जाता है , नाक भौं चढ़ाकर बन्द कमरों में बैठकर नहीं बल्कि रसूले रहमत की बज़्में सजाकर किया जाता है , हाँडियाँ उलटने से नहीं , बल्कि अहले मुहब्बत के लिए दस्तरख्वान लगाकर किया जाता है । हर मुल्क व कौम में इज़हारे मसर्रत के अलग – अलग अन्दाज़ हैं । जब दिलों में खुशी के जज़्बात उमड़ कर आते हैं तो वह अपने जुहूर के रास्ते खुद निकाल लेते हैं । 12 रबीउल अव्वल शरीफ में मीलादे मुस्तफा की मजलिसें सजाना , सलाम व नात के नग़मे सुनाना , घर – घर चरागाँ कराना , अहबाब व मसाकीन को खाना खिलाना , सदकात व खैरात की सबीलें लगाना और इश्को मुहब्बत से सरशार होकर जुलूस निकालना , मुसर्रत व शादमानी के इन्तेहाई बाबरकत अन्दाज़ हैं और किसी न किसी शक्ल में ये रिवायतें अहदे सहाबा से जारी हैं । ज़माने बदलते रहे , शुक्राने नेअमत और इज़हारे मुसर्रत के अन्दाज़ भी बदलते रहे ।

जुलूस व मीलाद के ये दिलकश अन्दाज़ जो आलमे इस्लाम में आज नज़र आते हैं। कुरूने सलासा के बाद शुरु हुए और यही क्या मौजूदा तर्ज़ के ये मदारिस और दारुलउलूम , ये क़ायद – ए – बगदादी से दौर – ए – हदीस तक का मौजूदा निसाब व निज़ाम । ये दस्तारबन्दी के जल्से , ये मुल्की व आलमी इज्तेमाआत , ये मज़हबी कान्फ्रेंसें और दारुलउलूमों के सदसाले , सब बाद ही की पैदावार हैं , मगर ये सब के नज़दीक बाअिसे अजरो सवाब हैं । इसी तरह गुलामों ने अपने आका मुस्तफा जाने रहमत की यादों की महफिलों में भी इज़हारे मुहब्बत के नित नये अन्दाज़ तराशे हैं और मीलाद की महफ़िलों से ये अन्दाज़ भी सदी दो सदी के बात नहीं बल्कि सदियों पुरानी रिवायत है।

मुहद्दिसे जलील हज़रत इमाम सखावी फरमाते हैं : ” मौजूदा सूरत में महफिले मीलाद का इन्एकाद कुरूने सलासा के बाद शुरु हुआ , फिर उस वक्त के तमाम मुल्कों और तमाम बड़े शहरों में अहले इस्लाम मीलाद शरीफ की महफिलों का इन्एकाद करते रहे हैं , इसकी रातों में सदक़ात व खैरात से फुकरा व मसाकीन की दिलदारी करते रहे हैं , हुजूर की विलादत बा सआदत का वाकिआ पढ़कर हाज़िरीन को बड़े एहतेमाम से सुनाया जाता है और इस अमल की बरकतों से अल्लाह तआला फ़ज़्ले अमीम की उन पर बारिश करता है । ( ज़ियाउन्नबी , जि -2 पे -47 )

सुलतान सलाहुद्दीन अय्यूबी के बहनोई शाह अरबल मलिक मुज़फ्फर अबूसईद रजि ० बड़े जौक व शौक से इस महफ़िल का इन्एकाद करते थे । मशहूर मुहद्दिस हाफिज़ इब्ने दहया ने जब मीलादे रसूल के हवाले से अपनी किताब ” अत्तन्वीर फ़ी मौलिदिल बशीरुन्नज़ीर ” ताजदारे अरबल के सामने पेश की तो वह खुशी से झूम उठे । और हाफिज़ इब्ने दहया को एक हज़ार अशरफी बतौर इन्आम पेश कीं ।

सिब्ते इब्नुल जौज़ी ने अपनी किताब | ” मिराअतुज्ज़मान ” में आशिके रसूल मलिक मुज़फ्फर के जश्ने ईद मीलादुन्नबी का दिलकश मन्ज़र सुपुर्दे कलम किया है । उनकी महफिले मीलाद में अकाबिर उलमा और एआज़िम सूफिया शिरकत फ़रमाते थे । मुसन्निफ महफिले मीलाद के एक चश्मदीद शाहिद के हवाले से रकमतराज़ हैं : ” मैंने मलिक मुज़फ़्फ़र के जश्ने ईद मीलादुन्नबी में भेड़ बकरियों के पाँच हज़ार सर , दस हज़ार मुर्गियाँ और फीरनी के एक लाख सिकोरे और हलवे के तीस हज़ार तश्त खुद देखे । जो उलमा और सूफिया इस ज़ियाफत में शिरकत फरमाते , मलिक मुज़फ्फर उन्हें ख़लअतें पहनाते , मलिक मुज़फ्फर मीलाद शरीफ की इस महफिल पर तीन लाख दीनार खर्च करते थे । “

मारूफ नक्काद मुहद्दिस अल्लामा अब्दुर्रहमान इब्ने जौज़ी फरमाते हैं कि महफिले मीलाद की खुसूसी बरकतों में से ये है कि जो इसको मुनअकिद करता है इसकी बरकतों से सारा साल अल्लाह तआला के हिफ़्ज़ो अमान में रहता है और अपने मक़सद और मतलूब को जल्दी हुसूल के लिए ये एक बशारत है ।

शारेह बुख़ारी इमाम कुस्तुलानी फरमाते हैं : ” रबीउल अव्वल चूँकि हुजूर की विलादत बा सआदत का महीना है । इसमें तमाम अहले इस्लाम हमेशा मीलाद की खुशी में महफिलों का इन्ऐकाद करते चले आ रहे हैं । इसकी रातों में सदक़ात और अच्छे आमाल में शिरकत करते हैं । खुसूसन इन महफिलों में आप मीलाद का तज़किरा करते हुए अल्लाह तआला की रहमतें हासिल करते हैं । महफिले मीलाद की ये बरकते महबूब है कि इसकी वजह से ये साल अमन से गुज़रता है । अल्लाह तआला उस आदमी पर अपना फ़ज़्ल व एहसान करे जिसने आपके मीलादे मुबारक को ईद मनाकर ऐसे शख़्स पर शिद्दत की जिस दिल में मर्ज़ है । ( अलमवाहिबुल् लुदुन्नियह , पे -27 )

सरवरे कौनेन स ० का इरशादे गरामी है : ” दोशम्बे को रोज़े रखो इसलिए कि मैं इसी दिन पैदा हुआ । “

इस हदीस से मालूम हुआ कि यौमे विलादत की याद बाक़ी रखने के लिए रोज़ा रखना मसनून है और उसकी और उसी के हुक्म में हर वह कारेखैर जिस से विलादते मुस्तफा की याद का रिश्ता हो । मीलादे मुस्तफा का नूरानी सिलसिला भी विलादते मुस्तफा की याद ताज़ा करता है इस मौके पर इज़हारे मुसर्रत का फायदा तो काफिर तक को मिलता है । बुखारी शरीफ़ की मशहूर रिवायत है कि हुजूर की विलादत बा सआदत की ख़बर जब अबूलहब की लौंडी सौबिया ने उसको दी । तो अपने भतीजे की विलादत की खुशख़बरी सुनकर उसने अपनी लौंडी को आज़ाद कर दिया । अगरचे उसकी मौत कुफ्र पर हुई और उसकी मज़म्मत में पूरी सूरत नाज़िल हुई लेकिन मीलादे मुस्तफा पर इज़हारे मुसर्रत की बरकत से पीर को उसे पानी का घूँट पिलाया जाता है और उसके अज़ाब में उस रोज़ तख़फीफ होती है । इस रिवायत पर तबसरा करते हुए अल्लामा अबुलखैर शम्सुद्दीन इब्ने जज़री फरमाते हैं : ” जब विलादते मुस्तफा स ० की खुशी पर उस काफिर को इन्आम मिला जिसकी मज़म्मत कुरआन में आई है तो क्या हाल होगा उस मुसलमान उम्मती का जो विलादते मुस्तफा पर खुशी मनाए और हुजूर की मुहब्बत में इमकान भर खर्च करे । ब कसम उसका इन्आम अल्लाह तआला की तरफ से जन्नते नईम है ।

मुहद्दिसीन और अकाबिर उलमा व मशाएख़ की लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने ईद ए मीलाद की महफिलों के जवाज व इस्तेहसान पर किताबें लिखीं और बरकात व हसनात के जुहूरिये रकम किये । अब हम यहाँ अकाबिरीन के चन्द फरमूदात नक़ल करते हैं जो बर्रेसगीर में बिला तफ़रीक सबके नज़दीक मुसल्लम हैं ।

मुहक्किक अलल इतलाक शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी लिखते हैं : ” ऐ अल्लाह ! मेरा कोई अमल ऐसा नहीं जिसे तेरे दरबार में पेश करने के लायक समझू । मेरे तमाम आमाल फ़सादे नियत का शिकार हैं , अलबत्ता मुझ फ़कीर का एक अमल महज़ तेरी ही इनायत से इस काबिल और लायके इल्तेफात है और वह ये है कि मजलिसे मीलाद के मौके पर खड़े होकर सलाम पढ़ता हूँ और निहायत ही आजिज़ी व इन्केसारी और मुहब्बत व खुलूस के साथ तेरे हबीबे पाक पर दुरूद व सलाम भेजता हूँ । ऐ अल्लाह ! वह कौन सा मुकाम है , जहाँ मीलादे पाक से बढ़कर तेरी तरफ से खैर व बरकत का नुजूल होता है ? इसलिए ऐ अरहमुर्राहिमीन ! मुझे पक्का यकीन है कि मेरा ये अमल कभी रायगाँ नहीं जायगा बल्कि यकीनन तेरी बारगाह में कुबूल होगा और जो कोई दुरूद व सलाम पढ़े और इसके ज़रिये से दुआ करे वह कभी मुस्तरद नहीं होगी । ” ( अखबारुल अख़यार -624 मतबूआ कराची )

हज़रत इमाम रब्बानी मुजद्दिद अल्फ़सानी फरमाते हैं : ” मजलिसे मीलाद शरीफ में अगर अच्छी आवाज़ से कुरआने पाक की तिलावत की जाए और हुजूरे अकदस स ० की नात शरीफ और सहाब – ए – कराम व अहले बैते एज़ाम व औलियाए अअलाम रजि ० की मनकबत के क़सीदे पढ़े जाएं तो इसमें क्या हर्ज है । ” ( मक्तूब नम्बर 187 , जि -1 पे -171 )

मुक्तदाए हिन्द हज़रत शाह वलियुल्लाह मुहद्दिस देहेलवी फरमाते हैं : ” मक्का मुअज्ज़मा में हुजूर की विलादत बा सआदत के दिन मैं एक ऐसी मीलाद की महफिल में शरीक हुआ जिसमें लोग आपकी बारगाहे अकदस में हदिय – ए – दुरूद व सलाम अर्ज़ कर रहे थे और वह वाकिआत बयान कर रहे थे जो आपकी विलादत के मौके पर ज़ाहिर हुए और जिनका मुशाहेदा आपस की बेअसत से पहले हुआ तो अचानक मैंने देखा कि इस महफिल पर अनवार व तजल्लियात की बरसात शुरु हो गई । अनवार का ये आलम था कि मुझे इस बात का होश नहीं कि मैंने जाहिरी आँखों से देखा था या फ़क़त बातिनी आँखों से , बहरहाल जो भी हो , मैंने गौरो खौज़ किया तो मुझ पर ये हक़ीक़त मुनकशिफ़ हुई कि ये अनवार उन मलाएका की वजह से हैं जो ऐसी मजालिस में शिरकत पर मामूर किये गये होते हैं और मैंने देखा कि अनवारे मलाएका के साथ – साथ रहमते बारी तआला का नुजूल भी हो रहा था । ” ( फुयूज़ुल हरमैन पे- 80,81 )

हज़रत अल्लामा शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहेलवी अलैहिर्रहमा लिखते हैं : – ” फ़कीर के मकान पर हर साल दो महफिलें होती हैं , एक महफिले मीलाद और दूसरी शहादते इमाम आली मक़ाम हुसैन रजि ० सैकड़ों की तादाद में लोग जमा होते हैं , दुरूद व सलाम व कुरआन मजीद पढ़ा जाता है , वअज़ होता है , बाद अज़ाँखाने पर ख़त्म पढ़ा जाता है और हुजूरे अकरम की बारगाह में सलाम पेश किया जाता है अगर ये सब बातें फ़कीर के नज़दीक नाजायज़ होतीं तो फ़क़ीर हरगिज़ ( फतावा अजीजिया ) न करता । “

शैखे तरीकत हज़रत हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की फ़रमाते हैं : ” हमारे उलमा मौलिदे शरीफ में बहुत तनाजुअ करते हैं । ताहम उलमा जवाज़ की तरफ भी गये हैं जब सूरत जवाज़ की मौजूद है फिर क्यों ऐसा तशद्बुद करते हैं और हमारे वास्ते इत्तेबाए हरमैन काफी है । अलबत्ता वक्ते एतेकादे तवल्लुद का न करना कयाम चाहिए । अगर एहतेमाल तशरीफ आवरी का किया जावे मुज़ायका नहीं , क्योंकि आलमे खल्क मुकैय्यद बज़मानो मकान है , लेकिन आलमे अम्र दोनों से पाक है बस कदम रंजा फरमाना जाते बाबरकत का बईद नहीं । ” ( शमाएमे इमदादिया पे -93 )

हज़रत हाजी साहब अपना मामूल बयान करते हुए लिखते हैं : ” मशरब फ़क़ीर का ये है कि महफिले मौलूद में शरीक होता हूँ बल्कि बरकात का ज़रिया समझकर हर साल मुनअकिद करता हूँ और कयाम में लुत्फ़ व लज्जत पाता हूँ । ” ( फैसल – ए – हफ्त मसला , पे -9 )

नाबग़ – ए – फिरंगीमहल हज़रत मौलाना अब्दुल हई लखनवी लिखते हैं : ” जो लोग मीलाद की महफिल को बिदअते मज़मूमा कहते हैं , खिलाफे शरअ कहते हैं । ” दिन और तारीख़ के तअय्युन के बारे में लिखते हैं : ” जिस ज़माने में बतरज़े मन्दूब महफिले मीलाद की जाए बाइसे सवाब है और हरमैन , बसरा , शाम , यमन और दूसरे मुमालिक के लोग भी रबीउल अव्वल का चाँद देखकर खुशी और महफिले मीलाद और कारेख़ैर करते हैं , और केरअत और समाअते मीलाद में एहतेमाम करते हैं , और रबीउल अव्वल के अलावा दूसरे महीनों में भी इन मुमालिक में मीलाद की महफिलें होती हैं और ये एतेक़ाद न करना चाहिए कि रबीउल अव्वल में मीलाद शरीफ़ किया जायगा तो सवाब मिलेगा वरना नहीं । ” ( फ़तावा अब्दुल हई जि -2 पे -283 ) |

अल्लाह तआला हम सबको भी अपने असलाफ़ व अकाबिर की तरह इश्के रसूल का सोज़ो गुदाज़ अता फरमाए , आमीन । अब हम नूर व सुरूर वाले इस नातमाम का किस्स – ए – लतीफ का सिलसिला शायरे मशरिक के एक आफाकी पैग़ाम पर बन्द करते हैं । आशिके रसूल डाक्टर इक़बाल फ़रमाते हैं : ” मेरे नज़दीक इन्सानों की दिमाग़ी व कल्बी तरबियत के लिए निहायत ज़रूरी है कि उनके अक़ीदे की रू से ज़िन्दगी का जो नमूना बेहतर है वह हर वक़्त उनके सामने रहे । चुनांचे मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वह उसवए रसूल को मद्देनज़र रखें ताकि जज़्बए तक़लीद और जज्बए अमल कायम रहे । इन जज़्बात को कायम रखने के लिए तीन तरीके हैं :

( 1 ) इन्फरादी तौर पर दुरूद व सलाम पढ़ना

( 2 ) इज्तेमाई तौर पर महाफिले मीलादुन्नबी मुनअकिद करना

( 3 ) किसी मुरशिदे कामिल की सोहबत इख़्तियार करना।
( आसारे इक़बाल , पे -305 मतबूआ हैदराबाद दकन )

प्रस्तुतकर्ता- रईस खान
क़ौमी फरमान, मुंबई

किताब- जश्न ए रहमतुललिल आलमीन स ० ( सोविनियर,2010)

लेख- मुबारक हुसैन मिस्बाही

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