मक्के से शुरू हुई इस्लाम की चिंगारी मदीना पहुँच कर आफताब बन गई

इस्लाम के पन्ने से

हिजरते मदीना आहजरत स ० एक ऐसा फैसला था जिसने कुछ ही समय में वो इंकलाब बरपा कर दिया जिसके लिये आप ने अपनी जिन्दगी मुबारक दांव पर लगा रखी थी ।

1- हिजरत के पश्चात इस्लाम के लिये वो सारे रास्ते खुल गये जिससे वो कुछ ही समय बाद एक महान विश्वव्यापी धर्म बन कर उभरा । जबकि मक्का में यह कुछ प्रताड़ित और गरीब लोगों का दीन था ।

2- हिजरत के बाद ही दीने इस्लाम को वो आकार और व्यवस्था मिली जो आज हम देखते हैं ।

3- ऑहज़रत स० के मदीने में पहुँचने के बाद मदीना एक दीनी राज्य बन गया ।

4- मदीना जब आध्यात्मिक और राजनैतिक शक्ति और विकास का केन्द्र बन गया तो उसके आस पास बसने वाले ज्यादातर लडाकू कबीले उसकी ओर आकर्षित होने लगे जिससे अरब शक्ति के एकीकरण का मार्ग खुल गया ।

5- ऑहज़रत स० उस इस्लामिक गणतंत्र के प्रधान शासक , न्यायाधीश , सेनापति , धर्माध्यक्ष यानी आप वहाँ के सर्वेसर्वा थे ।

ऑहज़रत स० ने मस्जिद के लिये जो ज़मीन पसंद फरमाई वो दो यतीम बच्चों सहेल और सुहैल की थी । इसी जमीन पर आपकी ऊँटनी आकर बैठी थी । इस जमीन में कुछ खजूरों के दरख़्त थे और कुछ पुरानी क़बरें थी । जब आपने इस जमीन के बारे में पूछा तो मुआज बिन अफरह ने अर्ज किया कि ये ज़मीन मेरे दो यतीम रिश्तेदार बच्चों की है और वो मेरे पास ही परवरिश पा रहे हैं । मैं उनको रज़ामन्द कर लूंगा आप यहाँ मस्जिद बनाएं ।

आपने बनु नज्जार के उन दोनों बच्चों को बुलवाया । बच्चे वो ज़मीन अपनी ओर से मस्जिद के लिये हदियतन देना चाहते थे लेकिन ऑहज़रत स० ने कुबूल नही फरमाया और उस ज़मीन को दस दीनार तलाई में ख़रीद लिया । कीमत हज़रत अबूबकर ने अदा की एक दूसरी रिवायत के अनुसार क़ीमत हज़रत अबू अय्यूब अंसारी ने चुकाई ।

एक रिवायत में है कि आहज़रत स० की हिजरत से पहले हज़रत साअद बिन जुर्राराह इसी ज़मीन पर यसरिब के मुसलमानों को नमाज़ पढ़ाया करते थे । जिन बच्चों की यह ज़मीन थी वो उन्हीं के ज़ेरे किफालत थे। जब तामीरे मस्जिद का काम शुरू हुआ तो आहज़रत स० ने स्वयं अपने हाथों से काम में शिरकत फरमाई । जमीन में जो दरख्त थे वो काट दिये गये , कबरे हटा दी गईं और खड्डों को भर कर ज़मीन हमवार कर दी गई । मस्जिद की दीवारों की बुनयाद पत्थर से बनाई गई और उस पर गारे की कच्ची ईंटों से दीवारें तामीर की गई । सुतून खजूर के तने के बनाए गये और छत खजूर के पत्तों और लकड़ियों की डाली गई । मस्जिद में किसी तरह की आराईश नहीं थी फर्श कच्चा था ।

ऑहजरत स० ज़मीन पर खड़े हो कर एक खजूर के तने से टेक लगाकर खुतबा फरमाते थे । बाद में मिम्बर बनाया गया , इस बारे में तीन रिवायतें हैं एक के अनुसार हजरत तमीमदारी ने मिम्बर बनाया था , दूसरी रिवायत में है कि हज़रत अब्बास के एक गुलाम ने मिम्बर बनाया और तीसरी रिवायत के मुताबिक एक अंसार खातून के गुलाम ने बनाया था ।

इस मिम्बर के तीन दरजात थे । आप ऊपर वाले पर बैठ कर बीच वाले पर पाँव मुबारक रखते थे । बाद में हज़रत अबूबकर जब खलीफा हुए तो आप बीच वाले पर बैठ कर पहले दरजे पर पाँव रखते थे । जब हजरत उमर का दौर आया तो आप पहले दरजे पर बैठ कर ज़मीन पर पाँव रखते थे । हज़रत उसमान ने शुरू में तो हज़रत उमर की तकलीद की लेकिन बाद में आप सबसे ऊपर तीसरे दरजे पर तशरीफ फरमाने लगे ।

मस्जिदे नबवी के साथ ही दो कमरे बनाए गये एक हजरत आइशा सिद्दीका के लिये और एक हज़रत सौदा के लिये । हुजरे मस्जिद से हट कर थे लेकिन उनके दरवाज़े मस्जिद की तरफ खुलते थे । आगे चलकर कुल नौ हुजरे उम्मुल मोमिनीन के लिये मस्जिदे नबवी के प्रांगण में बने । कुछ हुजरे खजूर की लकड़ी की दीवारों पर मिट्टी की लिपाई करके बनाए गये और कुछ मिट्टी और पत्थर से चुनकर हज़रत आइशा के हुजरे के पल्ले वाला लकड़ी का दरवाज़ा था और दीगर हुजरों के दरवाज़ों पर पुराने कम्बलों के परदे थे । हुजरे सात हाथ चौड़े और तकरीबन दस हाथ लम्बे थे । फर्श कच्चा था और छत पर खजूर के पत्ते थे । छतें ज़्यादा ऊँची नहीं थी । जब आप पूरे अरब के शहंशाह बन गये तो भी आपने इन्हीं हुजरों में कयाम फरमाया ।

जो मुसलमान मक्का मदीना आए थे वो दीन के लिये अपने घरबार , ज़िन्दगी भर की कमाई , अपने धंधे और व्यापार , अपने परिवार और दोस्त यानी ज़िन्दगी का हर आराम और सुख त्याग कर आए थे । इन मुहाजिरीन बहुतों की तो आर्थिक हालत बहुत ही ख़राब थी आँहज़रत स० ने उनका मनोबल बढ़ाने और उनकी मदद फ़रमाने के लिये मुहाजरीन और अंसार में दीनी भाईचारा स्थापित करवाया । एक दिन आपने सभी सहाबा को हज़रत उन्स बिन मालिक के घर पर तलब फरमाया । जब सब जमा हो गये तो आप स० ने अंसार को मुखातिब करके फरमाया- ये मुहाजरीन तुम्हारे भाई हैं , तुम दो दो आपस में भाई बन जाओ । आप ने हज़रत अली का हाथ पकड़कर फरमाया कि यह मेरा भाई है । इसके बाद आप स० दो दो मुसलमानों को बुलाते रहे और फरमाते रहे कि आज से तुम भाई भाई हो । इस समय अंसार ने बड़ी फय्याज़ी और हृदय की विशालता का सुबूत दिया । वो अपने भाइयों को अपने घर ले गये और जो कुछ माल घर पर था उसका आधा हिस्सा अपने भाइयों को दे दिया । दुनियां की तारीख़ में इस तरह की कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती ।

अंसार ने बढ़ चढ़ कर मुहाजिरीन का साथ दिया हर प्रकार से उनकी सहायता की । मुहाजिरीन अरब के एक प्रसिद्ध व्यापारिक वर्ग से सम्बंध रखते थे , कुछ ही समय में उन्होने अपने कारोबार स्थापित कर लिये और अपने पावों पर खड़े हो गये । आहज़रत स० ने मदीने पहुँचने के साथ ही शहर में शांति और अमन कायम करने और जो शहर में अलग अलग क़बीलों में आपसी दुश्मनी थी उसे ख़त्म करने की ओर विशेष ध्यान फ़रमाया । इस्लाम के फैलाव के साथ ही औस और ख़ज़रज की जो दुश्मनी थी वो तो समाप्त हो गई लेकिन मदीने में यहूदी भी आबाद थे और अन्य गैर मुस्लिम भी , इस बात को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी तदबीर की आवश्यकता थी जिससे शहर का हर व्यक्ति चाहे वो किसी भी धर्म का मानने वाला हो राजनैतिक और सामाजिक आधार पर एक राष्ट्रीय भावना में बंध जाए । इसके लिये आप ने सभी लोगों के अधिकार और कर्तव्य को प्रमाणिकता प्रदान करने के लिये एक समझौता किया जिसे मदीने के हर क़बीले और व्यक्ति ने स्वीकार किया । इस्लाम की तारीख़ का यह पहला राजनैतिक समझौता या घोषणापत्र था ।

प्रस्तुतकर्ता- रईस खान
क़ौमी फरमान, मुंबई

किताब- इस्लाम का इतिहास

लेखक- इसहाक फ़ौज़दार

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