UP election 2022: बीजेपी का विकल्प फिलहाल कांग्रेस ही है!

उत्तर प्रदेश फीचर

धनंजय कुमार
यूपी
के विधानसभा चुनाव में अभी वक़्त है, लेकिन पालतू मीडिया के नौकर पत्रकार सर्वे कर बताने में लगे हैं, आयेगा तो योगी ही। क्योंकि विपक्ष बिखरा हुआ है। यानी विपक्ष में एका होता तो योगी हार जाते! मतलब है योगी से बहुसंख्य जनता नाराज़ है। सर्वे के आधार पर नौकर पत्रकार जो व्याख्या कर रहे हैं, वो योगी और बीजेपी का प्रचार भर है।
राजनीति का विद्यार्थी भी जानता है कि यहाँ दो जोड़ दो चार नहीं होता, कई बार तीन या पांच भी हो जाता है। भारतीय राजनीति में जातीय आधार बहुत ही मज़बूत धुरी है और जातियों के बीच नाग और नेवला वाली कहानी है, बसपा दलितों की पार्टी है, सपा यादवों और मुसलमानों की, बीजेपी सवर्णों और हिन्दुओं की, जबकि कांग्रेस किसी जाति विशेष की पार्टी नहीं है- वह समावेशी है. भगवान शिव का घर है वह. नाग, चूहा, मोर, बैल और सिंह सब साथ रहते हैं।

कांग्रेस जानती है, उत्तर प्रदेश के चुनाव में रीजनल पार्टियों से समझौता बहुत सफल नहीं होना है, क्योंकि जातीय और धार्मिक आधार ही यहाँ जीत हार तय करेंगे फिलहाल। चुनाव बाद सरकार बनाने में सहयोग-समझौता करने से कोई गुरेज नहीं है. कांग्रेस की दोहरी परेशानी है, एक तो आर एस एस, बीजेपी और समाजवादी पार्टियों के दशकों से सुनियोजित और निरंतर विरोध ने जनमानस में कांग्रेस को कमजोर किया है, दूसरे मोदी और उनके कॉर्पोरेट मीडिया साथी ने राहुल को नालायक यानी पप्पू साबित करने में खासी मेहनत की है, कहें सबसे ज्यादा मेहनत की है, एड़ी चोटी जा ज़ोर लगा दिया है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसलिए मोदी के जन मानस में बढ़ती नाराज़गी के बाद बार बार ये सवाल उठाया गया कि मोदी का विकल्प क्या है? कांग्रेस के सत्ताखोर बुढ़ाते नेताओं ने भी राहुल के खिलाफ़ अपना ज़ोर लगाया और पार्टी में लोकतंत्र के नाम पर राहुल के नेतृत्व पर निरंतर सवाल उठाते रहे. हाँ, किसी की इतनी काबिलियत या हिम्मत नहीं हुई कि सोनिया राहुल को किनारे कर कांग्रेस का सर्वमान्य नेता ख़ुद को साबित कर ले। सबको ये अपेक्षा रही कि सोनिया राहुल को किनारे करके उन्हें नेता घोषित कर दें। यह हास्यास्पद सी बात है।
बीजेपी में लोकतंत्र के नाम पर क्या होता है, किसी से छुपा नहीं है कि मोदी के ख़िलाफ़ किसी की न तो पार्टी में बोलने की हिम्मत है ना मीडिया में। मोदी भक्ति नेता की ताकत और पार्टी का लोकतंत्रहो जाता है, लेकिन राहुल भक्ति कांग्रेस में एक परिवार का वर्चस्व हो जाता है. यह मीडिया द्वारा खड़ी की गयी परिभाषा है पार्टी के भीतर के लोकतंत्र और पार्टी के नेता की. लेकिन कांग्रेस और राहुल अपने एजेंडे पर चलते रहे शांत मन से, बिना अकबकाये, बिना घबराये. आज़ादी के बाद जितना हमला राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर हुआ है, शायद ही किसी नेता पर हुआ हो। किसने क्या नहीं कहा? अपने पराये सबने दोनों के लिए पूरी मेहनत और शिद्दत के साथ कब्र खोदी, लेकिन ये सोनिया गांधी का गुण है कि सोनिया कभी विचलित नहीं हुईं और राहुल को भी शांत रहने की प्रेरणा और सीख देती रहीं। समय के साथ राहुल ने धीरे धीरे ही सही, अपनी पहचान बना ली है, खासकर पढ़े लिखे नागरिकों का एक बड़ा वर्ग मान गया है कि राहुल पप्पू नहीं हैं, एक सुलझे हुए सीधे सादे व्यक्ति हैं। वह विरोधियों पर आक्रामक होकर वार नहीं करते, बल्कि जनमानस के सामने अपनी बात ईमानदारी से रखते हैं, न झूठ बोलते हैं ना फेंकते हैं. राहुल की यही विशेषता उन्हें मोदी से अलग करती है. राहुल को मोदी जी ने पप्पू कहा, बार बार कहा, लेकिन राहुल ने मोदी जी को कभी फेंकू नहीं कहा, बल्कि यह नाम जनता ने दिया।

यह ठीक है कि कुछ सालों से कांग्रेस के पास देश में व्यापक जनाधार नहीं है, लेकिन नेहरू के समय से कांग्रेस के विकल्प की जो तलाश चल रही थी, उसको लेकर स्थिति स्पष्ट हो गयी है कि वो विकल्प बीजेपी तो कतई नहीं है। कांग्रेस का विकल्प कांग्रेस ही हो सकती है। क्योंकि कांग्रेस एकमात्र पार्टी है जो किसी जाति-वर्ग या धर्म विशेष की पार्टी नहीं है। बाकी सारी पार्टियां अलग हैं। आम आदमी पार्टी भी बीजेपी की बी टीम बन गयी है, जिसका ध्यान भ्रष्टाचार से हटकर तीर्थयात्रा पर आ टिका है। तो सर्वे का आकलन ठीक या गलत हो सकता है, लेकिन अभी साफ़ जाहिर होता है, उसका लक्ष्य बीजेपी को अजेय बनाए रखना है। लेकिन विभिन्न राज्य के चुनावों ने साबित किया है बीजेपी अजेय नहीं है। इसलिए बीजेपी राजनीतिक पार्टियों को उकसाने में लगी है। मीडिया मुसलमानों की पार्टी के तौर पर ओवैसी को प्रोजेक्ट करती है तो बीजेपी के विकल्प के तौर पर कभी ममता बनर्जी को। वास्तव में यह प्रोजेक्शन बीजेपी की रणनीति का हिस्सा है।
(लेखक के ब्लॉग से साभार।)

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