UP election news: उप्र में बढ़ा मतदान, किसे नुकसान

उत्तर प्रदेश फीचर

अजय भट्टाचार्य
उत्तर प्रदेश
में पहले चरण के मतदान के बाद योगी सरकार में गन्ना मंत्री सुरेश राणा ने जिला निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखकर मुजफ्फरनगर की अपनी विधानसभा सीट थानाभवन के 40 बूथों पर फिर से मतदान कराने की मांग की थी। दो दिन पहले जिलाधिकारी ने उनकी यह मांग यह कहकर ठुकरा दी कि चुनाव में कही कोई गडबडी नहीं हुई है। राणा जिन 40 बूथों पर वह दोबारा मतदान चाहते हैं, वो मुस्लिम बहुल्य इलाकों में हैं। इन बूथों पर इस बार 70 से 90 फीसदी वोट पड़े हैं। वहीं, दूसरी ओर हिंदू बहुल्य बूथों पर पिछली बार के मुकाबले इस बार मतदान में गिरावट हुई है। ये तो पहले चरण की बात हुई। अब दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश के नौ जिलों की 55 सीटों पर दूसरे चरण के मतदान में पिछली बार के मुकाबले में एक प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। इस बार 64.71% लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जबकि 2017 में 65.71% लोगों ने वोट डाला था। अमरोहा, बरेली, मुरादाबाद, शाहजहांपुर, सहारनपुर, बिजनौर, संभल, रामपुर और बदायूं जिले में पड़ने वाली इन 55 सीटों पर कुल 586 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इन सीटों पर इस बार लड़ाई काफी कड़ी होने वाली है। दूसरे चरण में नौ जिलों की करीब 40 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर्स निर्णायक हैं। इसलिए हर कोई यह \ जानना चाहता है कि इन इलाकों में मतदान घटने या बढ़ने से किसे फायदा होगा?

शामली जिलाधिकारी का जवाबी पत्र


इस बार पहले चरण में 62.54% मतदान हुआ है। पिछली बार 63.10% लोगों ने वोट डाला था। इस बार कई मुस्लिम बहुल्य सीटों पर मतदान में बढ़ोतरी दर्ज हुई है। इनमें शामली जिले की कैराना सीट, अलीगढ़ की सदर सीट, बुलंदशहर की स्याना और सिकंदराबाद सीट, मेरठ जैसी सीटें शामिल हैं। कुछ सीटों पर समग्र मतदान की संख्या तो घट गई है, लेकिन मुस्लिम वोटर्स के बूथ पर मतदान काफी अधिक हुआ है। मुजफ्फरनगर की थानाभवन सीट इसका उदाहरण है।
दूसरे चरण में जिन नौ जिलों में मतदान हुआ, इन जिलों की 40 सीटों पर 30 से 55% मुस्लिम मतदाता हैं। मतलब इन सीटों पर मुस्लिम मतदाता काफी निर्णायक होने वाले हैं। 2017 में इन 55 में से 38 सीटों पर भाजपा की जीत हुई थी। 15 सीटों पर सपा और दो पर कांग्रेस उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। समाजवादी पार्टी ने जिन 15 सीटों पर जीत दर्ज की थी, उसमें से 10 मुस्लिम उम्मीदवार जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंचे थे। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पिछली बार कांग्रेस और समाजवादी पार्टी मिलकर चुनाव लड़े थे। जबकि रालोद और बसपा ने अकेले ताल ठोकी थी। ऐसी स्थिति में बसपा को उन्हीं सीटों पर मुस्लिम मत मिले जहां उसने मुस्लिम कैंडिडेट उतारे थे। जबकि जाट, गुर्जर वोट एकतरफा भाजपा के खाते में गया था। इस बार सपा और रालोद एक साथ लड़ रहे हैं। कांग्रेस के कई उम्मीदवार टिकट लेने के बाद सपा में शामिल हो गए। ऐसे में मुस्लिम मतों के सपा-रालोद गठबंधन के खाते में एकतरफा जाने की आशंका है। इस बार भाजपा से नाराज जाट और गुर्जर भी सपा गठबंधन का साथ दे सकते हैं। इसका सीधा नुकसान भाजपा को होगा। उत्तर प्रदेश की सियासत के जानकारों के मुताबिक अंदाजा लगाया जा सकता है कि मतदान घटने या बढ़ने से किसका फायदा हुआ और कौन नुकसान में गया? अगर हम दूसरे चरण वाली 55 सीटों की बात करें तो इनमें 80% सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं। अगर इन सीटों पर खासतौर पर मुस्लिम बहुल्य बूथों पर मतदान बढने का मतलब भाजपा को सीधा नुकसान होगा। ऐसी स्थिति में सबसे ज्यादा फायदा समाजवादी पार्टी को मिल सकता है। हालांकि, इन चुनावी जिलों से कई ध्रुवीकरण वाली राजनीति के वीडियो सामने आ चुके हैं। ऐसे में अगर यहां ध्रुवीकरण की राजनीति हावी होती है तो फिर मुकाबला कांटे का हो सकता है।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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