Uttarakhand congress: दर्द ए रावत

फीचर

अजय भट्टाचार्य
पंजाब
की गुत्थी सुलझाते-सुलझाते कांग्रेस नेता हरीश रावत आज उत्तराखंड में खुद पहेली बनकर उभरे हैं। चंद ट्वीट और एक निजी चैनल को दिए उनके साक्षात्कार का सारांश यह है कि कांग्रेस में वे दुखी महसूस कर रहे हैं। आखिर उनके दुःख का कारण क्या है कि वे अचानक वैराग्य भाव में आ गये हैं और ‘न दैन्यं न पलायनं’ जप रहे हैं।

हरीश रावत ने अपने नज़दीकी को उत्तराखंड कांग्रेस का अध्यक्ष बनवाया। तब प्रीतम सिंह उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष थे जिन्हें हटाकर विधायक दल का नेता बनाया गया और हरीश रावत ने अपने सबसे क़रीबी गणेश गोदियाल को उत्तराखंड कांग्रेस का अध्यक्ष बनवा दिया। यहाँ तक सब ठीक था। अब रावत कहते हैं कि उत्तराखंड कांग्रेस का संगठन साथ नहीं हैं। तो क्या फिर गणेश गोदियाल को अध्यक्ष बनाना हरीश रावत की गलती थी! रावत जब संवाददाता सम्मेलन में यह बता रहे थे कि कुछ संगठन के लोग नकारात्मक काम कर रहे हैं उस वक़्त संगठन के मुखिया और उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश गोदियाल भी उनके साथ ही बैठे हुए थे। वास्तविकता यह है कि रावत अध्यक्ष बदलने में तो क़ामयाब हो गए लेकिन नए अध्यक्ष की कमेटी, जिसमें ख़ासतौर पर जिला और ब्लॉक अध्यक्ष बनाए जाते हैं, वह नहीं बना पाए। जिसका मतलब है कि अध्यक्ष नया है और टीम पुरानी जिसमें तारतम्य की बहुत कमी है। रावत पांच-छह ज़िला अध्यक्ष भी बदलवाना चाहते हैं/थे। इसके अलावा चुनाव लड़ने के लिए टिकटों के बंटवारे में वर्चस्व और परिवार के सदस्यों के भी टिकट उनकी प्राथमिकता थे और हैं।
इसलिये

कुछ ही दिनों पहले एक राजनीतिक गुगली भी डाल दी कि, पंजाब की तर्ज़ पर उत्तराखंड में भी किसी दलित चेहरे को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए। इस बयान ने यशपाल आर्य तुरंत उनके पाले में पहुंच गए जो हाल ही में भाजपा को जय श्रीराम कहकर कांग्रेस में शामिल हुए थे। उत्तराखंड में कांग्रेस के चेहरे पर चुनाव लड़ने की बाबत प्रभारी देवेंद्र यादव हमेशा कहते हैं कि, सामूहिक नेतृत्व पर कांग्रेस चुनाव लड़ेगी। रावत ने बहुत इंतज़ार किया कि कभी तो वह दिन आएगा कि दिल्ली आलाकमान या फिर दिल्ली का नेतृत्व कर रहे प्रभारी देवेंद्र यादव कहेंगे कि हरीश रावत कांग्रेस का चेहरा होंगे। लेकिन यह इंतज़ार लम्बा हो गया था और शायद इसलिए उनका बयान पार्टी के भीतर ‘भूकंप’ की तरह देखा जा रहा है। कांग्रेस की आंतरिक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक़, उत्तराखंड में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन कर रही है। पिछले गुरुवार को कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने उत्तराखंड के वरिष्ठ नेताओं के साथ देहरादून में बैठक में कहा था, कोई कोटा सिस्टम नहीं चलेगा, “जो जिताऊ है और टिकाऊ है” पार्टी उसे ही चुनाव लड़ाएगी। रही सही कसर कांग्रेस आलाकमान ने उत्तराखंड के लिए जो स्क्रीनिंग कमेटी बनायी है वह आमतौर पर दिल्ली में बैठक किया करती थी लेकिन इस बार कांग्रेस आलाकमान द्वारा बनायी हुई यह स्क्रीनिंग कमेटी हर ज़िले में जाकर जीतने वाले उम्मीदवार को ढूंढ रही है। ऐसे में रावत के साथ जो बाक़ी और वरिष्ठ नेता हैं, जिन्हें अपने कोटे में समर्थकों के लिए टिकट चाहिए, वह इस बात से भी नाराज़ हैं। इस नाराजगी का प्रस्फुटन रावत के ट्वीट में परिलक्षित होता है। फ़िलहाल रावत का दुःख राहुल गाँधी ने यह आश्वासन देकर कम कर दिया है कि उत्तराखंड के चुनाव उनकी ही अगुवाई में लड़े जायेंगे। मगर दिक्कत यह है कि रावत अपने विरोधियों से इतने डरे हुए हैं कि अपने समर्थकों से अपील कर रहे हैं कि उनके स्वागत सत्कार के लिए लगाये जाने वाले पोस्टरों/होर्डिंग्स में अपना नाम या चेहरा न चिपकाएं। कारण इससे रावत खेमे के लोगों की पहचान हो जाएगी और विरोधी खेमा उनके टिकट के रास्ते में रोड़े अटका देगा। रावत की रणनीति यह है कि अपने लोगों को अधिक से अधिक उम्मीदवारी दिलवाएं जिससे सरकार बनने लायक स्थिति बने तो उनके आगे कोई रोड़ा न बने। क्योंकि 2002 में रावत ही चुनावी चेहरा थे मगर जीतने के बाद लाटरी नारायण दत्त तिवारी के नाम की लगी। इस बार रावत कोई खतरा नही उठाना चाहते।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published.