तृप्तिकरण में वोट बैंक की तलाश

फीचर राजनीति

अजय भट्टाचार्य
पिछले
दिनों हैदराबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में उस जमात के लिए प्रेम प्रदर्शित किया जिसे उनकी पार्टी और उनके समर्थक देशद्रोही, बाहरी और न जाने क्या-क्या विशेषण दिए हैं। इसलिये तुष्टिकरण से तृप्तिकरण का नया जुमला बाहर आया और पसमांदा मुसलमानों से संपर्क साधने का आह्वान उन्होंने पार्टीजनों से किया। देश के नए भौगोलिक इलाकों में अपने विस्तार की कोशिश में जुटी भाजपा ने अगले 30-40 साल की राजनीतिक रणनीति बनाने की कवायद के तहत नए वोट बैंक तलाश रही है। यह नया वोट बैंक पसमांदा मुसलमानों का है।
देश की कुल मुस्लिम आबादी का 85 फीसदी हिस्सा पसमांदा समाज का आता है। 2011 की जनगणना के हिसाब से 19.2 फीसदी मुसलमानॉन में 85 फीसदी पिछड़े और दलित मुस्लिम हैं, जो मुस्लिम समाज में एक अलग सामाजिक लड़ाई लड़ रहे हैं। ‘पसमांदा’ फ़ारसी शब्द है जिसका संधि विच्छेद करेंगे तो पस का मतलब होता है पीछे और मांदा का अर्थ होता है पिछड़ जाना। मतलब वो लोग जो पिछड़े’ हैं दबाए गए या सताए हुए हैं। इसका उपयोग मुसलमानों के बीच दलित और पिछड़े वर्ग के लिए किया जाता है।
ज्यादातर पसमांदा हिंन्दुओं से ही धर्मांतरित होकर मुसलमान बने है इसलिए वे भी हिन्दुओं की तरह जातियों में बंटे हैं। पिछली सदी के दूसरे दशक में इसे लेकर चलने वाले आंदोलन को मोमिन आंदोलन कहा गया, जबकि 90 के दशक में राष्ट्रीय स्तर पर कई बड़ी संस्थाओं ने पिछले और दलित मुस्लिमों की आवाज उठानी शुरू की। मुसलमानों में कुंजरे (राइन), जुलाहा (अंसारी), धुनिया (मंसूरी), कसाई (कुरैशी), फकीर (अल्वी), हज्जाम (सलमानी), मेहतर (हलालखोर), ग्वाला (घोसी), धोबी (हवाराती), लोहार-बढ़ाई (सैफी), मनिहार (सिद्दीकी), दर्जी (इदरीसी), वनगुर्जर जाति और समुदाय के लोग पसमांदा की पहचान के साथ एकजुट हो रहे हैं।
‘पसमांदा मुस्लिम’ शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1998 में अली अनवर अंसारी ने किया था, जब उन्होंने पसमांदा मुस्लिम महाज़ की स्थापना की थी। पूर्व राज्यसभा सांसद और अखिल भारतीय पसमांदा मुस्लिम महाज़ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और संस्थापक अली अनवर अंसारी के मुताबिक पसमांदा में अब तक दलित शामिल हैं, लेकिन सभी पसमांदा दलित नहीं हैं। संवैधानिक रूप से कहें तो हम सभी एक ही श्रेणी में हैं- ओबीसी। लेकिन आगे चलकर हम चाहते हैं कि दलित मुसलमानों को अलग से पहचाना जाए। राष्ट्रीय धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक आयोग, जिसे न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा आयोग के नाम से जाना जाता है, ने मई 2007 में प्रस्तुत रिपोर्ट में स्वीकार किया गया था कि जाति व्यवस्था ने मुसलमानों सहित भारत में सभी धार्मिक समुदायों को प्रभावित किया है। पसमांदा मुसलमानों की ज्यादा जनसंख्या वाले 5 राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, बंगाल और दिल्ली में क्रमशः 3.5 करोड, 1.5 करोड़, 40 लाख, 2 करोड़ और 17 लाख है। मीडिया रिपोर्ताज के मुताबिक पसमांदाओं के लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए आंदोलन आजादी से पहले की अवधि में इसके सबसे प्रसिद्ध ध्वजवाहक अब्दुल कय्यूम अंसारी और मौलाना अली हुसैन असीम बिहारी थे, दोनों जिनमें से जुलाहा (बुनकर) समुदाय से आते थे। इन दोनों नेताओं ने उस समय मुस्लिम लीग द्वारा प्रचारित की जा रही सांप्रदायिक राजनीति का विरोध किया और सभी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने के लीग के दावे को चुनौती दी। 1980 के दशक में, महाराष्ट्र के अखिल भारतीय मुस्लिम ओबीसी संगठन ने पसमांदाओं के अधिकारों के लिए लड़ाई का नेतृत्व करना शुरू किया। 90 के दशक में डॉक्टर एजाज अली और अली अनवर के दमदार संगठनों के अलावा शब्बीर अंसारी ने भी ऑल इंडिया मुस्लिम ओबीसी आर्गनाइजेशन खड़ा किया था। शब्बीर महाराष्ट्र से ताल्लुक रखते हैं।
प्रधानमंत्री के उद्बोधन के बाद भाजपा के साथ-साथ अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी सक्रिय हो गया है। निकट भविष्य में आप मुस्लिम बस्तियों, घरों, चौपालों, मजलिसों में संघ और भाजपा के लोग भोजन करते नजर आयें तो आश्चर्य न कीजियेगा। तुष्टिकरण से तृप्तिकरण तक की यात्रा आरंभ ह चुकी है। इसका अर्थ यह नही है कि चैनलों पर हिंदू-मुस्लिम बहस बंद हो जाएगी। वह जारी रहेगी क्योंकि पसमांदा हिंदुओं को भी साथ रखना है जो एक कथित पिछड़े को 7 लोक कल्याण मार्ग में स्थापित होते देख पिछले आठ वर्षों से अगड़े होने की प्रक्रिया में हैं।

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