बंगाल में कमजोर संगठन भाजपा को ले डूबा

राजनीति समाचार

अजय भट्टाचार्य
बंगाल
की 108 नगरपालिकाओं के चुनावी नतीजों में कई बातें उभर कर सामने आयीं। एक तरफ तृणमूल ने एक बार फिर बहुमत से जीत दर्ज की तो वहीं तृणमूल के बाद सबसे अधिक सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों को मिलीं। भाजपा को पीछे छोड़ते हुए वाममोर्चा विपक्षी पार्टी बनकर सामने आया और कांग्रेस व भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियां सबसे पीछे चली गयीं। संगठन की कमजोरी और उम्मीदवारों के गलत चयन ने भाजपा को तबाह कर दिया। दिग्गज भाजपा नेताओं के इलाकों में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा और किसी भी नगरपालिका में भाजपा कब्जा नहीं कर पायी। कुल 2171 सीटों में से भाजपा के हिस्से केवल 63 सीटें आईं।
भाजपा के बड़े-बड़े नेता अपने ही वार्ड नहीं बचा पाये। कांथी का 15 नंबर, बालुरघाट का 22 नंबर और भाटपाड़ा का 17 नं. वार्ड प्रदेश भाजपा के 3 बड़े नेताओं सुवेंदु अधिकारी, सुकांत मजूमदार और अर्जुन सिंह के हैं। तीनों ही वार्डों में तृणमूल के सामने भाजपा के सभी बड़े नेता धराशायी हो गये। विधानसभा में विपक्ष के नेता अधिकारी का घर ‘शांतिकुंज’ कांथी नगरपालिका के 15 नं. वार्ड में है। उस अधिकारी गढ़ में ही तृणमूल की तनुश्री चक्रवर्ती ने 228 वोटों से भाजपा उम्मीदवार को हरा दिया। कुछ ऐसा ही हाल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार के वार्ड में हुआ। सुकांत मजूमदार बालुरघाट के सांसद भी हैं और इस बार पालिका चुनाव उनके लिए किसी सम्मान की लड़ाई से कम नहीं थी। हालांकि बालुरघाट नगरपालिका तो दूर की बात है, अपने घर यानी 22 नं. वार्ड में भी भाजपा उम्मीदवार को तृणमूल से हजार वोटों से अधिक के अंतर से हार का सामना करना पड़ा। शुभेंदु और सुकांत से भी बुरी हालत बैरकपुर के भाजपा सांसद अर्जुन सिंह की हुई। उनका दुर्ग कहलाने वाला भाटपाड़ा में भाजपा की शोचनीय हार हुई। अर्जुन का घर ‘मजदूर भवन’ भाटपाड़ा नगरपालिका के 17 नं. वार्ड में है। उस वार्ड में अर्जुन सिंह के भतीजे सौरव सिंह को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया था, लेकिन चुनाव के ठीक पहले ही वह तृणमूल में शामिल हो गये। भाजपा का नामांकन वापस कर सौरव और उसके पिता सुनील सिंह तृणमूल में लौट गये। इस कारण अर्जुन के घर में ही तृणमूल बगैर प्रतिद्वंद्विता के जीत गयी। इसी तरह मिदनापुर के भाजपा सांसद दिलीप घोष के इलाके की 2 नगरपालिकाओं मिदनापुर और खड़गपुर में तृणमूल का परचम लहराया। हालांकि दिलीप उस पालिका इलाके के निवासी नहीं हैं, उनका घर गोपीबल्लभपुर में है। गत वर्ष विधानसभा चुनाव में भाजपा वहां से भी हार गयी थी। गत विधानसभा चुनाव में जिस तरह 200 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य रखने के बाद भाजपा को केवल 77 सीटें मिली थीं और उसके बाद नगर निगमों और अब पालिका चुनाव के नतीजों में जिस प्रकार पार्टी विपक्ष से खिसककर तीसरे या चौथे स्थान पर पहुंच गयी, ऐसे में इसका काफी असर वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है। कहा जा रहा है कि अभी से अगर पार्टी ने संगठन विस्तार पर ध्यान नहीं दिया तो फिर 2024 के चुनाव में पार्टी के सांसदों की संख्या भी कम हो सकती है। ऐसे में अब 2024 का लोकसभा चुनाव बंगाल में भाजपा के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
भाजपा की ऐसी हार पर हाल में पार्टी से बहिष्कृत विक्षुब्ध नेता रितेश तिवारी ने कहा कि वर्ष 2015 में भाजपा के 138 पालिका प्रतिनिधि चुने गये थे। उस चुनाव में भी तृणमूल ने काफी रिगिंग की थी। राज्य चुनाव आयुक्त थे सुशांत उपाध्याय। उन्हें इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया गया था। इन सबका कारण है कि उस समय संगठन वर्चुअल नहीं था। उम्मीद है कि पार्टी इस हालत से उबरेगी। वहीं प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता शमीक भट्टाचार्य ने कहा कि इस चुनावी नतीजों को भाजपा नहीं मानती है क्योंकि स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए हैं। इन नतीजों से भाजपा के संगठन पर कोई असर नहीं पड़ेगा, हम राज्य की चुनावी बैठक में थे, हैं और रहेंगे। पार्टी सूत्रों के अनुसार, जिस प्रकार की स्थिति पालिका चुनाव में भाजपा की हुई, उसे देखते हुए जल्द ही पार्टी की ओर से चिंतन बैठक की जाएगी। इसमें पार्टी के इस बुरे प्रदर्शन को लेकर चर्चा की जा सकती है।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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