West Bengal news: फिर वही घेराव, फिर वही ममता

राजनीति राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
यह
पहली बार नही है जब तृणमूल को चुनाव से पहले न घेरा गया हो। 2014 के आम चुनाव से पहले 2013 में सारडा चिटफंड मामले में तृणमूल को घेरा गया था। उस वक्त वाममोर्चा और कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया था मगर फैसला जनता ने तृणमूल के हक में दिया। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने दोबारा सारडा नारदा घोटाले का आरोप लगाते हुए तृणमूल को हराने के लिए ताकत झोंक दी लेकिन जीत तृणमूल की हुई क्योंकि जनता का समर्थन ममता को मिला। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा एक बार फिर वर्चस्व साबित करने के लिए तृणमूल को घेर रही है। अब देखना है कि इस बार जनता ममता बनर्जी पर भरोसा करती है या यह राजनीति बाजी पलट देगी।
इसलिए जैसे ही यह मामला सामने आया और पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी हुई, ममता सहित पूरी पार्टी ने खुद को अलग करते हुए घोषणा कर दी कि यदि अपराध हुआ है तो दोषी को सजा दी जाये। ममता बनर्जी की खुद की छवि बेहद ईमानदार नेता की है जिस पर बट्टा लगते वे कभी नहीं देखना चाहतीं। इसलिए बीते सोमवार को बंग विभूषण समारोह में भाषण देते हुए ममता ने साफ कह दिया कि अगर कोई दोषी साबित होता है तो आजीवन कारावास की सजा दी जाए और वह भ्रष्टाचार का समर्थन नहीं करती। ममता इस बात से उत्तेजित थीं कि विपक्ष घोटाले को लेकर उनको भी संदेह के दायरे में ला रहा है। उनकी नाराजगी सही थी। शायद ही किसी को ममता की ईमानदारी पर शक हो। ममता की व्यक्तिगत छवि अच्छी होने के कई कारण हैं। लंबे समय तक सांसद रहने के बावजूद ममता पूर्व सांसद वाली पेंशन नहीं लेतीं। बतौर मुख्यमंत्री भी वह अपना वेतन नहीं ले रही हैं। उनका गुजारा पुस्तकों और गीतों की रॉयल्टी और पेंटिंग की बिक्री से मिली रकम से चलता है। सादगी आज भी उनकी पहचान बनी हुई है।

यह भी सच है कि तृणमूल कांग्रेस में पार्थ चटर्जी को ममता बनर्जी के बाद सबसे महत्वपूर्ण ओहदा मिलता आया है। पार्टी के नाराज नेताओं को मनाना हो या पार्टी के नियमों के बारे में नेताओं को समझाना हो, पार्थ को हर वह जिम्मेदारी दी गयी थी जिसकी वजह से उन्हें नंबर टू तक कहते थे। आज स्थिति बदल सी गयी है। पार्थ दा आज पार्टी में नंबर टू नहीं रहे। उन पर शिक्षक नियुक्ति में घोटाले का आरोप है। मामले में वह गिरफ्तार तक हो गये हैं जिसके बाद पार्टी को एक बड़ा झटका लगा है। हालांकि इस बारे में खुलकर कोई कुछ कहना नहीं चाहता लेकिन दबी जुबान में हर छोटा-बड़ा नेता मान रहा है कि यह पार्टी के लिए ऐसा झटका है जिससे बड़ा नुकसान हुआ है। इस नुकसान को संभालने के लिए अब पार्टी के पास सिर्फ जनता का सहारा है जिसके भरोसे पर ही तृणमूल की नांव पार होगी। तृणमूल के उपाध्यक्ष जय प्रकाश मजुमदार के अनुसार यह पूरा का पूरा मामला राजनीतिक षड्यंत्र के तहत रचा गया है। भाजपा बंगाल में हार के बाद साम-दाम-दंड-भेद की राजनीति कर रही है। यहां वह असंवैधानिक ताकत का इस्तेमाल कर शासन करना चाह रही है। इस बात का अंदेशा तृणमूल को अच्छी तरह है कि पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी के बाद भाजपा आने वाले समय में कुछ भी कर सकती है, क्योंकि भाजपा वह पार्टी है जो जीती नहीं तो छीन कर लेना जानती है। तृणमूल आज उस स्थिति में आ गयी है जहां पार्टी के लिए जनता का समर्थन सबसे बड़ा है। पार्टी के नेता दबी जुबान से यह मान भी रहे हैं कि भाजपा एजेंसियों का इस्तेमाल कर प्रतिहिंसा की राजनीति जितना चाहे कर ले, आखिरी हथियार जनता का समर्थन होता है जो बंगाल में ममता बनर्जी के साथ है। अब नेता इसी जनता के बीच जाकर अपनी जगह मजबूत करेंगे। इस पूरी घटना में अर्पिता मुखर्जी अहम किरदार के रूप में उभरी है। भाजपा अर्पिता का नाम पार्थ के साथ ही तृणमूल के साथ भी जोड़ रही है, इस पर तृणमूल लगातार पल्ला झाड़ती आयी है। तृणमूल समझ रही है कि जिस तरह पूरे मामले में अर्पिता का नाम तृणमूल से जोड़ा जा रहा है वह साबित करता है कि इसके पीछे ‘राज’ है। मामला है तो जांच हो, सच सामने आये यही पार्टी का सीधा स्टैंड है।

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