West Bengal: सीबीआई से घोष चाहते क्या हैं..!

समाचार

अजय भट्टाचार्य
क्या
दिलीप घोष को आगे करके भाजपा सीबीआई पर इस बात का दबाव डालना चाहती है कि बंगाल के मामलों में किसी भी तरह सीबीआई तृणमूल पर शिकंजा कसे? अथवा यह भाजपा की अंदरूनी उठापटक है जिसमें सीबीआई को बेवजह घसीटा जा रहा है। हाल के दिनों में केन्द्रीय एजेंसियों की कार्यवाही और कार्रवाई जिस तरह से एकतरफा हो रही है उससे उसकी साख पहले ही दांव पर लग चुकी है। ऐसे में केंद्र की सत्ता पर आरूढ़ पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जब सीबीआई पर आरोप लगाये तो हंगामा तो होना ही है। पहले कोलकाता में एक कार्यक्रम में दिलीप घोष ने कहा था कि सीबीआई के साथ सेटिंग हो गयी थी। वित्त मंत्रालय ने यह समझते हुए यहां ईडी को दुर्नीति मामले की जांच के लिए भेजा। उनके इस बयान से केंद्रीय जांचकारी संस्था का अपमान और उसके कार्यों पर अविश्वास करने की बात तृणमूल कह रही है। एक दिन बाद भी दिलीप घोष ने न्यूटाउन के ईको पार्क में मॉर्निंग वॉक के वक्त फिर कहा कि सीबीआई देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी है। हमने उम्मीद की थी, लेकिन न्याय नहीं मिला। चुनाव के बाद हमारे 60 कार्यकर्ताओं की मौत हो गयी। कोर्ट ने सीबीआई को कहा था कि जांच कर कदम उठाये, लेकिन सीबीआई तो एफआईआर भी दायर नहीं कर सकी। इसकी तुलना में ईडी काफी बेहतर काम कर रही है। साबित कर दिया कि ईडी ही सबसे विश्वसनीय एजेंसी है।’
रविवार को घोष ने कहा था, ‘अदालत के निर्देश पर सीबीआई जांच होने पर भी कोई असर नहीं पड़ रहा था। गत कई वर्षों से बंगाल में सीबीआई के साथ सेटिंग की जा रही थी। वित्त मंत्रालय ने यह समझते हुए ही ईडी को भेजा है। ईडी पालतू नहीं है, काटेगी। जिन्होंने सेटिंग की थी, वे ही अब ईडी की जांच पर आपत्ति कर रहे हैं, अदालत जा रहे हैं। सवाल कर रहे हैं कि ईडी क्यों जांच करेगी ?’
जाहिर है सीबीआई की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाकर घोष ने परोक्षत: अपनी ही पार्टी के बड़े नेता अमित शाह को ही लपेट लिया है, क्योंकि सीबीआई केन्द्रीय गृह मंत्रालय के तहत आती है जिसके मंत्री अमित शाह हैं। भीतर की खबर यह है कि घोष पर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व खफा है। उनके बयानों को लेकर कहा जा रहा है कि यह सीधे तौर पर केंद्र सरकार पर ‘अविश्वास’ है। सीबीआई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘पर्सनल’ मंत्रालय के अधीन आती है। दिलीप घोष के बयानों को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजुमदार से रिपोर्ट तलब की है। भाजपा के सांगठनिक महासचिव बी.एल. संतोष ने भी अपने असंतोष की बात प्रदेश नेतृत्व को बतायी है।
घोष का आरोप है कि सीबीआई के कुछ अधिकारियों और तृणमूल कांग्रेस के बीच सांठगांठ रहने के चलते कोयला घोटाला, मवेशी तस्करी मामला और स्कूल भर्ती अनियमितता की जांच में कोई नतीजा नहीं निकला है। जांच महीनों तक खींची गई। इधर तृणमूल के महासचिव कुणाल घोष ने आरोप लगाया कि केंद्र की भाजपा सरकार सीबीआई और ईडी का अपने विरोधियों के खिलाफ राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है। ईडी ने स्कूल भर्ती घोटाले में बंगाल के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी को, जबकि सीबीआई ने मवेशी तस्करी मामले में तृणमूल के बीरभूम जिला इकाई के अध्यक्ष अनुब्रत मंडल को गिरफ्तार किया है। इस राजनीतिक बयानबाजी के बीच यह तथ्य भी विचारणीय है कि जब अदालत के आदेश पर कुछ मामलों की जाँच सीबीआई कर रही है तब उसकी जाँच पूरी होने से पहले ही उसके कार्य पर ऊँगली उठाकर घोष और ऊनि पार्टी क्या चाहती है? यही कि जिस-जिस मामले में जिन-जिन के खिलाफ जाँच के आदेश हैं उन्हें बिना सबूत जुटाए गिरफ्तार कर लिया जाये! जाँच के आदेश का अर्थ संबंधित व्यक्ति का गुनहगार होना भी नहीं है, बल्कि जाँच यह तय करती है कि को आरोप लगाये जा रहे हैं वे सही हैं या गलत। घोष को इतनी जल्दबाजी क्यों है?

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