जब एक दिव्यांग मुस्लिम लड़की के लिए जे पी नड्डा ने कानून बदल दिया, आज वह बड़ी डाक्टर है

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कभी-कभी कुछ हादसे जिंदगियां बदल देते हैं, ऐसा ही कुछ हुआ रोशन शेख के साथ। गरीबी और बदहाली में जीने वाली इस लड़की का। मुंबई के अंधेरी रेलवे स्टेशन पर एक एक्सीडेंट में इसके दोनो पैर काटने पड़े, इसके बावजूद यह हिम्मत नही हारी और आज MBBS और MD है।
डाक्टर रोशन शेख 16 साल की थी जब ट्रेन हादसे का शिकार हो गई। दोनों पैर काटने पड़े। तीन महीने अस्पताल में रही। 89% हैंडिकेप्ट। ऊपर से घर की माली हालत। एक वक्त का खाना खाते, तो दूसरे वक्त के लिए इधर-उधर सड़कों पर भटकना पड़ता। लोग कहते तुम धरती पर बोझ हो, घर-परिवार के लिए बोझ हो, मर क्यों नहीं गई।
रोशन शेख ने अपनी यह आप बीती कहानी दैनिक भास्कर अखबार के साथ साझा किया है। उसने भास्कर को बताया है कि, 2018 में मैंने MD के लिए अप्लाई किया, तो फिर वही कानून आड़े आया। मैं बहुत उदास हो गई। इसके बाद अखबारों में मेरे बारे में खबर छपी। उसी दौरान सांसद किरीट सोमैया का फोन आया। मैंने उन्हें बताया कि फॉर्म भरने में सिर्फ दो दिन बचे हैं। नियमों का हवाला देकर मुझे रोका जा रहा है। उन्होंने मेरी बात सुनी और फोन रख दिया।
कुछ देर बाद मेरा फोन बजा। उधर से आवाज आई कि मैं हेल्थ मिनिस्टर जेपी नड्डा बोल रहा हूं। फौरन फॉर्म भरो। एक वक्त के लिए मेरा तो दिमाग ही काम नहीं किया कि ये हो क्या रहा है। इससे पहले मैं उन्हें जानती भी नहीं थी।

जब मैं फॉर्म भरने लगी तो देखा कि 47% डिसेबिलिटी का फैक्टर हटा दिया गया था। मैंने फॉर्म भरा। MD में मुझे एडमिशन मिला। देश के आखबारों में मेरी फोटो और खबर छप गई कि रौशन की वजह से 20 साल पुराने कानून में बदलाव हो गया है।

रोशन की इसके पहले की कहानी बेहद दर्दनाक और भावनात्मक है। उसने अखबार को बताया है कि, मूल रूप से मैं यूपी की आजमगढ़ से हूं। काफी पहले अब्बू मुंबई आ गए थे। यहां जोगेश्वरी में एक कमरे में हम तीन बहनें, भाई और अम्मी-अब्बू रहते थे। खाना, पीना, नहाना सबकुछ उसी कमरे में।
अब्बू रास्ते में टाट बिछाकर कांदा बटाटा बेचते थे। देर रात जब घर लौटते तो कभी उनकी जेब में 10 रुपए होते तो कभी 20 रुपए।
मुझे याद है जब दीदी 10वीं में गई तो रिश्तेदारों ने बहुत ताने मारे। उन लोगों ने अब्बू से कहा कि लड़की को घर से बाहर पढ़ने क्यों भेज रहे। घर की इज्जत की धज्जियां क्यों उड़ा रहे, लेकिन पापा ने सबकी बात अनसुनी कर दी।

दीदी ने 10वीं में स्कूल में टॉप किया। वह मुझे अक्सर कहती थी कि पढ़ाई पर फोकस करो, हमारी किस्मत पढ़ाई से ही बदलेगी। उस वक्त मेरी उम्र 8 साल थी। बड़े भाई के साथ स्कूल जाती।

अब्बू तीन किलोमीटर पैदल चलकर हमारे लिए खाना लाते। स्कूल से आने के बाद भाई के साथ मैं भी कांदा बटाटा बेचती। हम दोनों चिल्ला-चिल्ला कर बोलते कि दस का ढ़ाई किलो, दस का ढ़ाई किलो…।
हमें लगता कि चिल्लाने से हमारी बिक्री ज्यादा होगी। हमारी कोशिश होती कि कैसे भी करके कॉपी-किताब के लिए पैसे जुट जाए। इस तरह 6-7 साल सड़कों पर कांदा बटाटा बेचा।
जब 14 साल की हुई, तो लग कहने लगे कि सयानी लड़की का सड़क पर खड़े होकर कांदा बेचना सही नहीं है। फिर मैं घर में रहने लगी।


इसके बाद हमने पैसे कमाने का दूसरा तरीका अपनाया। हम सिर पर दस-दस किलो की जींस की गठरी उठाकर लाते और घर में उसके फालतू धागे छुड़ाते। साथ ही हमने कुंदन की ज्वेलरी बनाना, कपड़े सिलना, बटन छांटना जैसे काम किए। दिवाली पर क्राफ्ट मार्केट से लाइटें लाकर बेचते थे, ताकि कुछ रुपयों की व्यवस्था हो जाए।

अब्बू का कहना था कि जो कुछ भी करना है खुद के बल पर करना है, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना है।

मुझे याद है रमजान में इफ्तारी के लिए खजूर तक नहीं होता हमारे पास। चटनी और मोटी रोटी के साथ रोजे खोले हैं हमने। पानी के लिए लाइन में खड़े हुए सुबह से शाम हो जाती, तब जाकर एक केन पानी मिलता था।
इस बीच दीदी को डायलिसिस टेक्नीशियन की पार्ट टाइम नौकरी मिल गई। उन्हें 1500 रुपए मिलते थे। इससे हमें थोड़ी हिम्मत मिली। फिर मेरी भी 10वीं हो गई। मैंने मुंबई के जोगेश्वरी इलाके के सभी स्कूलों में टॉप किया।
मैंने बहन से पूछा कि क्या करूं। उसने कहा कि मैं डॉक्टर नहीं बन सकी, तुम डॉक्टर बनो, मैं मदद करूंगी। इसके बाद मैंने 11वीं में साइंस स्ट्रीम में दाखिला लिया।

7 अक्टूबर 2008 की बात है। फर्स्ट सेमेस्टर के पेपर खत्म हो गए थे। मैं लोकल ट्रेन से बांद्रा से जोगेश्वरी जा रही थी। जैसे ही अंधेरी स्टेशन आया, मैं गेट के पास चली गई, ताकि उतरते वक्त भीड़ से बच सकूं। कुछ देर बाद मुझे किसी ने धक्का दिया या मैं खुद ही गिर गई, मुझे याद नहीं, एक ही झटके में ट्रेन के पटरियों पर आ गिरी।

मेरे पैर के ऊपर से ट्रेन गुजर गई। मेरा एक पैर कटकर बुर्के में फंसा था। दूसरे पैर से खूब खून बह रहा था। दर्द इतना कि बता नहीं सकती।
धीरे-धीरे भीड़ इकट्ठी होने लगी। जोर से प्यास लगी थी। पानी-पानी मैं चीख रही थी। लोगों से मिन्नतें कर रही थी कि कोई पानी पिला दो, मेरे अब्बू-अम्मी को फोन कर दो, लेकिन कोई सामने नहीं आया। सब तमाशा देखते रहे।
फिर शादाब नाम का एक आदमी दौड़ते हुए आया। उसने मुझे पानी पिलाया और मेरे घर फोन किया। तब तक पुलिस आ चुकी थी। आधे घंटे बाद मुझे स्ट्रेच्रर पर अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टरों की हड़ताल चल रही थी। मेरे जख्म पर बीटाडीन लगाकर छोड़ दिया गया। सारा दिन अकेली स्ट्रेचर पर पड़ी रही। मुझे किसी ने नहीं देखा।

शाम होते-होते भाई वहां आ गया। मैंने भाई से कहा कि मेरा पैर कट गया है। उसने कहा कि कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा। थोड़ी देर बाद परिवार के बाकी लोग भी आ गए। अस्पताल वाले न तो मेरा इलाज कर रहे थे और न ही मुझे डिस्चार्ज कर रहे थे।
काफी हंगामे के बाद उन लोगों ने मुझे रेफर किया। इसके बाद मैं दूसरे हॉस्पिटल में एडमिट हुई। दीदी और जीजा इसी अस्पताल में डायलिसिस टेक्नीशियन की नौकरी करते थे।

वहां डॉक्टर संजय कंथारिया ने मेरा इलाज करना शुरू किया। उन्होंने कहा कि अगर यह लड़की 24 घंटे जिंदा रह गई, तो बच सकती है, वरना मैं कुछ कह नहीं सकता। हादसे की वजह से मेरा काफी सारा खून बह चुका था। अनगिनत सर्जरी हुई। 24 घंटे के बाद मुझे होश आया।
होश आने के बाद दीदी ने कहा रौशन तुम्हारा एक पैर नहीं रहा, मैंने कहा हां मुझे पता है। फिर वो बोली कि तुम्हारा दूसरा पैर भी नहीं रहा, इस बात ने मुझे बहुत तकलीफ दी, मैं बहुत रोई। मैं ये तो जानती थी कि ट्रेन से मेरा एक पैर कट चुका है, लेकिन वक्त पर इलाज न मिलने की वजह से दूसरे पैर में गैंगरीन हो गया था, लिहाजा उसे भी काटना पड़ा।
इस दौरान तीन महीने मैंने अस्पताल में जो झेला है, वो मैं ही जानती हूं। जो लोग अस्पताल में मिलने आते थे, वे बोलते कि लड़की है, पैर कट गए हैं, अब क्या करेगी, मां-बाप पर बोझ बन गई है। कल मां मर जाएगी तो क्या करेगी, वॉशरूम आना-जाना, खाना-पीना कैसे करेगी, इसकी शादी कैसे होगी….

मुझे लगने लगा कि खुदा ने मुझे जिंदा ही क्यों रखा है, मर क्यों नहीं गई।

तीन महीने बाद मैं अस्पताल से डिस्चार्ज हो गई। मां ही मुझे टॉयलेट ले जाती, नहलाती और खाना खिलाती। मुझे लगा कि इस उम्र में तो मुझे अम्मी की सेवा करनी चाहिए और वह मुझे गोद में उठाकर टॉयलेट लेकर जा रही हैं। ऊपर से लोग ताना मार रहे। मेरा हौसला और टूटता था।
डॉक्टर संजय कंथारिया से मेरी हालत देखी नहीं गई। उन्होंने मेरे जीजा से कहा कि इसपर तरस खाना बंद करो, यह खुद सारे काम करेगी और डॉक्टर भी बनेगी। इसे किताबें दो यह पढ़ाई करेगी।

उन्होंने मुझसे कहा कि तुम अपने पैरों पर खड़ी हो जाओगी। आजकल बहुत अच्छी-अच्छी टेक्नीक आ गई हैं। मैं तुम्हें डॉक्टर बनने में हर संभव मदद करूंगा, बस तुम पढ़ाई करो।

जीजा ने मुझे हाथों के बल चलना सिखाया। बेड से उतरना सिखाया, खुद टॉयलेट जाना सिखाया। धीर-धीरे मैं टॉयलेट सीट पर जाकर बैठने लगी। इस हादसे के बाद भी मैंने 11वीं ड्रॉप नहीं की।
अम्मी मुझे व्हील-चेयर पर एग्जाम दिलवाने ले जाती थीं। मेरी टीचर्स मुझे घर आकर पढ़ाती थीं। स्कूल का पूरा मैनेजमेंट मेरे साथ था। स्टूडेंट्स से डोनेशन लेकर मेरी मदद भी की गई।

आखिरकार 2009 में मुझे आर्टिफिशियल पैर लग गए। इसके बाद मैंने तय कर लिया था कि अब मैं खड़ी हो गई हूं तो खड़ी होकर ही दिखाऊंगी, बोझ नहीं बनूंगी किसी पर।

मैंने 12वीं की और कॉलेज में टॉप किया। मैंने मेडिकल एंट्रेंस का एग्जाम दिया, महाराष्ट्र में थर्ड रैंक मिली। मुझे खुशी का ठिकाना नहीं था, लगा कि अब तो मैं डॉक्टर बन ही गई हूं। जेजे अस्पताल में काउंसिलिंग थी, लेकिन मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया यानी MCI ने मुझे खारिज कर दिया।

मुझसे बोला गया कि एक कानून है जिसके तहत 40 से 70% हैंडीकैप्ड कैंडिडेट को ही मेडिकल में एडमिशन मिल सकता है। आप 89% डिसेबल हैं, आपको दाखिला नहीं मिल सकता।
मैंने डॉ.संजय कंथारिया को फोन मिलाया। उन्होंने कहा कि सीधे बॉम्बे हाईकोर्ट जाओ। मैंने तो कोर्ट देखा ही नहीं था और न ही कुछ पता था कि कैसे याचिका लगाई जाती है। उन्होंने मुझे एक वकील बीपी पाटिल से बात करने लिए कहा।

मैं बीपी पाटिल के पास गई और सारी बात बताई। बीपी पाटिल ने मेरा केस लड़ा। तीन महीने ट्रायल चला। MCI की दलील थी कि ये लड़की एक क्लास से दूसरे क्लास में कैसे जाएगी। इसकी वजह से लेक्चर डिले होगा। फिर डॉक्टर बनने के बाद मरीजों का इलाज कैसे कर सकेगी। इसलिए इसे दाखिला नहीं मिलना चाहिए।
केस की आखिरी सुनवाई थी। अम्मी-अब्बू और वकील बीपी पाटिल ने मुझसे कहा कि आज तुम लोकल ट्रेन से बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचो। पैर कटने के बाद मैं पहली बार लोकल ट्रेन से जोगेश्वरी से सीएसटी स्टेशन पहुंचकर बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंची।

मेरे वकील ने जज से कहा कि सर ये लड़की लोकल ट्रेन से यहां तक आई है, आप कैसे कह सकते हैं कि यह मेडिकल नहीं कर पाएगी। बीते तीन महीने से जज मुझे ऑब्जर्व कर रहे थे कि मैं कैसे चलती हूं, कैसे खाती हूं, कैसे काम करती हूं।
खैर फैसले का वक्त आया। मैंने अपने आंख कान बंद कर लिए थे। मुझे लगता था कि मैं केस हार जाऊंगी। तभी मेरे वकील दौड़कर पास आए और बोले- रौशन तुम जीत गई हो, तुम केस जीत गई हो… मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था। मैं उस लम्हे को शब्दों में बयां नहीं कर सकती।

अगले दिन अखबारों में मेरी खबर छपी कि एक लड़की के दाखिले के लिए कानून बदलना पड़ा।

इस तरह मुझे MBBS में दाखिला मिल गया। कॉलेज में मैंने बहुत बहुत मेहनत की। चार-चार घंटे प्रैक्टिकल के लिए खड़े रहना, लिफ्ट अक्सर बंद रहती थी, तो सीढ़ियों से जाना। ऊपर से परिवार की तंगहाली। पहले साल मैंने कॉलेज में टॉप किया। वहां से मुझे हौसला मिला।
मेरे पैरों में काफी पेन होता था। हर रात रोती भी थी। फिर खुद को समझाती कि मुझे दूसरी जिंदगी मिली है, पैर ही तो गए हैं। दिमाग तो है न, बाकी बॉडी पार्ट तो हैं। मैं अपने दिमाग से अपने पांव पर खड़ी होकर रहूंगी। 2016 में मेरा MBBS हो गया। मैंने टॉप किया।

2018 में मैंने MD के लिए अप्लाई किया, तो फिर वही कानून आड़े आया। मैं बहुत उदास हो गई। इसके बाद अखबारों में मेरे बारे में खबर छपी। उसी दौरान सांसद किरीट सोमैया का फोन आया। मैंने उन्हें बताया कि फॉर्म भरने में सिर्फ दो दिन बचे हैं। नियमों का हवाला देकर मुझे रोका जा रहा है। उन्होंने मेरी बात सुनी और फोन रख दिया।

कुछ देर बाद मेरा फोन बजा। उधर से आवाज आई कि मैं हेल्थ मिनिस्टर जेपी नड्डा बोल रहा हूं। फौरन फॉर्म भरो। एक वक्त के लिए मेरा तो दिमाग ही काम नहीं किया कि ये हो क्या रहा है। इससे पहले मैं उन्हें जानती भी नहीं थी।

भाजपा नेता किरीट सोमैया के साथ डाक्टर रोशन शेख।

जब मैं फॉर्म भरने लगी तो देखा कि 47% डिसेबिलिटी का फैक्टर हटा दिया गया था। मैंने फॉर्म भरा। MD में मुझे एडमिशन मिला। देश के आखबारों में मेरी फोटो और खबर छप गई कि रौशन की वजह से 20 साल पुराने कानून में बदलाव हो गया है।

MD करने के बाद मैंने अपने जैसे लोगों को मोटिवेट करना शुरू किया। मुझे अलग-अलग जगहों पर स्पीच के लिए बुलाया जाने लगा। मुझे 400 से ज्यादा नेशनल और इंटरनेशनल अवॉर्ड मिल चुके हैं।
साभार: भास्कर

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