नबी का मक्के वालों ने क्यों किया बायकाट, क्यों तायफ वालों ने मारे पत्थर?

इस्लाम के पन्ने से

नबी का मक्के वालों ने क्यों किया बायकाट, क्यों तायफ वालों ने मारे पत्थर?

एलाने नबुव्वत के सातवें साल में कुफ्फ़ारे मक्का ने जब देखा कि रोज़ बरोज़ मुसलमानों की तादाद बढ़ती जा रही है और हज़रते हम्ज़ा व हज़रते उमर जैसे बहादुराने कुरैश भी दामने इस्लाम में आ गए तो यह लोग आपे से बाहर हो गए और तमाम सरदाराने कुरैश और मक्का के दूसरे कुफ्फ़ार ने यह स्कीम बनाई कि हुजूर स० और आप के खानदान का मुकम्मल बायकॉट कर दिया जाए और इन लोगों को किसी तंग जगह में घेरकर इनका दाना पानी बन्द कर दिया जाए ताकि यह लोग मुकम्मल तौर पर तबाह व बरबाद हो जाएं। चुनान्चे इस ख़ौफ़नाक प्लान के मुताबिक तमाम क़बीले कुरैश ने आपस में यह मुआहदा किया कि जब तक बनी हाशिम के खानदान वाले हुजूर स० को कत्ल के लिये हमारे हवाले न कर दें।

1 कोई शख्स बनू हाशिम के खानदान से शादी बियाह न करे।

2 कोई शख़्स इन लोगों के हाथ किसी किस्म के सामान की खरीदो फरोख्त न करे ।

3 कोई शख्स इन लोगों से मेलजोल , सलाम व कलाम और मुलाक़ात व बात न करे।

4 कोई शख़्स इन लोगों के पास खाने पीने का कोई सामान न जाने दे ।

मन्सूर बिन इक़रमा ने इस मुआहिदे को लिखा और तमाम सरदाराने कुरैश ने इस पर दस्तखत कर के इस दस्तावेज़ को काबे के अन्दर चिपका दिया । अबू तालिब मजबूरन हुजूरे अक्दस स० और दूसरे तमाम ख़ानदान वालों को लेकर पहाड़ की उस घाटी में जिस का नाम “शअबे अबीतालिब ” था वहाँ ठहरे । अबू लहब के सिवा खानदाने बनू हाशिम के सभी लोगों ने भी खानदानी रिवायत की बिना पर इस मुआमले में हुजूर स० का साथ दिया और सब के सब पहाड़ के इस तंग व तारीक दुर्रे में रहकर कैदियों की ज़िन्दगी बसर करने लगे।

और यह तीन बरस का ज़माना इतना सख्त और कठिन गुज़रा कि बनू हाशिम दरख़्तों के पत्ते और सूखे चमड़े पका पका कर खाते थे। और इनके बच्चे भूक प्यास की शिद्दत से तड़प तड़प कर दिन रात रोया करते थे । संगदिल और ज़ालिम काफ़िरों ने हर तरफ़ पहरा बिठा दिया था कि कहीं से भी घाटी के अन्दर दाना पानी न जाने पाए ।

मुसल्सल तीन साल तक हुज़ूर स० और खानदाने बनू हाशिम इन कठिनाइयों को झेलते रहे यहां तक कि खुद कुरैश के कुछ रहमदिलों को बनू हाशिम की इन मुसीबतों पर रहम आ गया और उन लोगों ने इस जालिमाना मुआहदे को तोड़ने की तहरीक उठाई ।

चुनान्चे हिशाम बिन अम्र आमिरी , जुहैर बिन अबी उमय्या , मुतइम बिन अदी , अबुल बख़्तरी , जम्आ बिन अल अस्वद वगैरा यह सब मिल कर एक साथ हरमे काबा में गए और जुहैर ने जो अब्दुल मुत्तलिब के नवासे थे कुफ्फ़ारे कुरैश को मुखातिब करके अपनी पुरजोश तक़रीर में यह कहा कि ऐ लोगो ! यह कहां का इन्साफ़ है कि हम लोग तो आराम से ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं और ख़ानदाने बनू हाशिम के बच्चे भूक प्यास से बेक़रार होकर बिलबिला रहे हैं । खुदा की कसम ! जब तक इस वहशियाना मुआहिदे के दस्तावेज़ फाड़ कर पांव से न रौंद दिये जाए तब तक मैं हरगिज़ हरगिज़ चैन से नहीं बैठ सकता। यह तक़रीर सुन कर अबू जहल ने तड़प कर कहा कि ख़बरदार ! हरगिज़ हरगिज़ तुम इस मुआहिदे को हाथ नहीं लगा सकते। जुम्आ ने अबू जहल को ललकारा और इस जोर से डांटा कि अबू जहल की बोलती बन्द हो गई ।

इसी तरह मुतइम बिन अदी और हिशाम बिन अम्र ने भी खम ठोंक कर अबू जहल को झिड़क दिया और अबुल बख़्तरी ने तो साफ़ साफ़ कह दिया कि ऐ अबू जहल ! इस ज़ालिमाना मुआहिदे से न हम पहले राज़ी थे और न अब हम इस के पाबन्द हैं । इसी मजमा में एक तरफ अबू तालिब भी बैठे हुए थे। उन्होंने कहा कि ऐ लोगो ! मेरे भतीजे मुहम्मद स० कहते हैं कि उस मुआहिदे के दस्तावेज़ को दीमक ने खा डाला है और सिर्फ़ जहां जहां खुदा का नाम लिखा हुआ था उस को दीमक ने छोड़ दिया है । लिहाजा मेरी राय यह है कि तुम लोग उस दस्तावेज को निकाल कर देखो अगर वाकई उस को दीमक ने खा लिया है जब तो उस को फाड़ कर के फेंक दो । और अगर मेरे भतीजे का कहना गलत साबित हुआ तो मैं मुहम्मद स० को तुम्हारे हवाले कर दूंगा । यह सुन कर मुतइम बिन अदी काबे के अन्दर गया और दस्तावेज़ को उतार लाया और सब लोगों ने उस को देखा तो वाकई सिर्फ अल्लाह तआला के नाम के पूरे दस्तावेज़ को दीमक ने खा लिया था । मुतइम बिन अदी ने सब के सामने उस दस्तावेज को फाड़ कर फेंक दिया ।

और फिर कुरैश के चन्द बहादुर हथियार ले कर घाटी में पहुंचे और खानदाने बनू हाशिम के एक एक आदमी को वहां से निकाल लाए और उनको उनके मकानों में आबाद कर दिया। मन्सूर बिन इक्रमा जिसने इस दस्तावेज़ को लिखा था उस पर यह क़हरे इलाही टूट पड़ा कि उस का हाथ शल हो कर सूख गया ।

हुजूर स० “शअबे अबीतालिब ” से निकल कर अपने घर में तशरीफ़ लाए और चन्द ही रोज़ कुफ्फ़ारे कुरैश के जुल्मो सितम से कुछ अमान मिली थी कि अबू तालिब बीमार हो गए और घाटी से बाहर आने के आठ महीने बाद इनका इंतकाल हो गया। अबू तालिब की वफ़ात हुज़ूर स० के लिये एक बहुत ही तकलीफ देह रही क्योंकि बचपन से जिस तरह प्यार व महब्बत के साथ अबू तालिब ने आपकी परवरिश की थी और ज़िन्दगी के हर मोड़ पर जिस जांनिसारी के साथ आप की मदद और कठिनाइयों का मुक़ाबला किया था इसको भला हुजूर किस तरह भूल सकते थे ?

हज़रते बीबी खदीजा की वफ़ात

हुज़ूरे अक्दस स० के कल्बे मुबारक पर अभी अबू तालिब के इन्तकाल का ज़ख़्म ताज़ा ही था कि अबू तालिब की वफ़ात के तीन दिन या पांच दिन के बाद हज़रते बीबी ख़दीजा भी रिहलत फ़रमा गई। मक्का में अबू तालिब के बाद सब से ज्यादा जिस हस्ती ने रहमते आलम स० की हिमायत में अपना तन मन धन सब कुछ कुरबान किया वह हज़रते बीबी ख़दीजा थी । जिस वक्त दुन्या में कोई आपका मुख़्लिस मुशीर और ग़म ख़्वार नहीं था हज़रते बीबी ख़दीजा ही थीं कि हर परेशानी के मौक़अ पर पूरी जांनिसारी के साथ आप स० की गम ख़्वारी और दिलदारी करती रहती थीं इसलिये अबू तालिब और हज़रते बीबी ख़दीजा दोनों की वफ़ात से आप के मददगार और गुम गुसार दोनों ही दुन्या से उठ गए जिससे आप के कल्बे नाजुक पर इतना अज़ीम सदमा गुज़रा कि आपने इस साल का नाम ‘ आमुल हुज्न ” ( गम का साल ) रख दिया। वफ़ात के वक़्त हज़रते ख़दीजा की उम्र पैंसठ बरस थी । आपको मक़ामे हुजून ( क़ब्रिस्तान जन्नतुल मअला ) में दफन किया गया। खुद नबी स० क़ब्र में उतरे और अपने मुक़द्दस हाथों से उनको ज़मीन के सुपुर्द फ़रमाया।

ताइफ का सफर

मक्का वालों के इनाद और सरकशी को देखते हुए जब हुजूर को उन लोगों के ईमान लाने से मायूसी ने तब्लीगे इस्लाम के लिये मक्का के कुर्बो जवार की बस्तियों का रुख किया । चुनान्चे इस सिल्सिले में आप स० ने ” ताइफ ” का भी सफ़र फ़रमाया ।

इस सफ़र में हुजूर स० के गुलाम हज़रते जैद बिन हारिसा भी आप के साथ थे । ताइफ में बड़े बड़े उमरा और मालदार लोग रहते थे । उन रईसों में ” अम्र ” का ख़ानदान तमाम क़बाइल का सरदार शुमार किया जाता था। येह लोग तीन भाई थे । अब्दे यालील , मसऊद , हबीब । हुजूर उन तीनों के पास तशरीफ़ ले गए और इस्लाम की दावत दी । उन तीनों ने इस्लाम कुबूल नहीं किया बल्कि इन्तहाई बेहूदा और गुस्ताखाना जवाब दिया। उन बदनसीबों ने इसी पर बस नहीं किया बल्कि ताइफ के बदमाश गुन्डों को उभार दिया कि यह लोग हुजूर के साथ बुरा सुलूक करें ।

चुनान्चे लुच्चों लफंगों का यह बदमाश गिरोह हर तरफ से आप स० पर टूट पड़ा और यह शरारती लोग आप पर पत्थर बरसाने लगे यहां तक कि आप के मुक़द्दस पांव जख्मों से लहू लुहान हो गए । और आप के मोज़े और जूते मुबारक ख़ून से भर गए । जब आप ज़ख्मों से बेताब हो कर बैठ जाते तो यह ज़ालिम इंन्तहाई बेदर्दी के साथ आप का बाजू पकड़ कर उठाते और जब आप चलने लगते तो फिर आप स० पर पत्थरों की बारिश करते और साथ साथ तानाजनी करते। गालियां देते। तालियां बजाते। हंसी उड़ाते।

हज़रते जैद बिन हारिसा दौड़ दौड़ कर हुज़ूर स० के सामने अपना बदन पर लेते थे और हुज़ूर पर आने वाले पत्थरों से आप को बचाते थे यहां तक कि वह भी ख़ून में नहा गए और ज़ख्मों से निढाल हो कर बेक़ाबू हो गए । यहां तक कि आखिर आपने अंगूर के एक बाग़ में पनाह ली । यह बाग़ मक्का के एक मशहूर काफ़िर उत्बा बिन रबीआ का था । हुज़ूर का यह हाल देख कर उत्बा बिन रबीआ और उस के भाई शैबा बिन रबीआ को आप पर रहूम आ गया और काफ़िर होने के बावजूद खानदानी हमिय्यत ने जोश मारा ।

चुनान्चे उन दोनों काफ़िरों ने हुज़ूर को अपने बाग में ठहराया और अपने नसरानी गुलाम ‘ अद्दास ” के हाथ से आप की खिदमत में अंगूर का एक खोशा भेजा। हुज़ूर ने बिस्मिल्लाह पढ़ कर खोशे को हाथ लगाया तो अद्दास तअज्जुब से कहने लगा कि यहां के लोग तो यह कलिमा नहीं बोला करते ! हुजुर स ० ने उससे दरयाफ्त फ़रमाया कि तुम्हारा वतन कहां है ? अद्दास ने कहा कि मैं ” शहर नैनवा ” का रहने वाला हूं । आप स ० ने फ़रमाया कि वह हुज़रत यूनुस बिन मत्ता का शहर है । वोह भी मेरी तरह खुदा के पैग़म्बर थे । यह सुन कर अद्दास आप के हाथ पांव चूमने लगा और फ़ौरन ही आप का कलिमा पढ़ कर मुसलमान हो गया ।

प्रस्तुतकर्ता- रईस खान
क़ौमी फरमान, मुंबई

किताब का नाम- सीरते मुस्तफा स०

लेखक- मौलाना अब्दुल मुस्तफा आज़मी

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