खिराज ए अक़ीदत: मुसलमानों के ‘मसीहा’ क्यों कहे गए मुलायम…!

लेख

रईस खान
क़ौमी फरमान, मुंबई

मुसलमानों के मसीहा के नाम से मशहूर मुलायम यादव को लोग ‘ मुल्ला मुलायम’ भी कहते थे। उन्होंने अपनी सरकारों में उर्दू और मुस्लिम हित के लिए कई योजनाएं और नियम लागू किये। उन्होंने अपने शासन के दौरान बाबरी मस्जिद बचाने का भी पूरा प्रयास किया था।वीएचपी के आह्वान पर जब 30 अक्तूबर 1990 को लाखों कारसेवक अयोध्या में इकट्ठा हुए थे। उनका उद्देश्य था कि विवादित स्थल पर बाबरी मस्जिद को तोड़कर मंदिर का निर्माण किया जाए। जब हजारों की संख्या में लोग विवादित स्थल के पास की एक गली में इकट्ठा हुए, उसी वक्त सामने से पुलिस और सुरक्षाबलों ने गोली चला दी। इसमें कई लोग गोली से तो कई लोग भगदड़ से मारे और घायल हुए। और मस्जिद नुकसान से बच गई थी।

हालांकि बाबरी मस्जिद ढहाने के आरोपी कल्याण सिंह से हाथ मिलाने से लेकर मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों पर आंखें मूंद लेने और दादरी की संवेदनशील घटना पर हाथ झाड़ लेने का मुलायम सिंह यादव का अपना दाग़दार इतिहास है। विपक्षी पार्टियां भी मौलाना मुलायम पर कई बार मुस्लिम विरोधी होने का आरोप लगा चुकी हैं। बसपा पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव रहे नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी ने तो एक सभा में चुटकी लेते हुए यहां तक कह डाला था कि -‘टोपी पहन लेने से कोई मुसलमान नहीं हो जाता. सच तो ये है कि मुलायम की धोती के नीचे खाकी नेकर नज़र आएगा.’

मुलायम सिंह यादव मीडिया को कोई भी ऐसा मौका नहीं देते, जिससे कि उनके ऊपर ‘भाजपा’ के क़रीबी होने का आरोप लगे। जबकि राजनीतिक हलकों में यह बात मशहूर थी कि अटल बिहारी वाजपेयी से उनके व्यक्तिगत रिश्ते बेहद मधुर थे। विकीपीडिया के मुताबिक वर्ष 2003 में उन्होंने भाजपा के अप्रत्यक्ष सहयोग से ही प्रदेश में अपनी सरकार बनाई थी।
उत्तर प्रदेश में यादव समाज के सबसे बड़े नेता के रूप में मुलायम सिंह की पहचान रही। उत्तर प्रदेश में सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने में मुलायम सिंह ने साहसिक योगदान किया। मुलायम सिंह की पहचान एक धर्मनिरपेक्ष नेता की रही। उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी समाजवादी पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी माना जाता रहा। उत्तर प्रदेश की सियासी दुनिया में मुलायम सिंह यादव को प्यार से ‘नेता जी’ कहा जाता था।

मुलायम सिंह उत्तर भारत के बड़े समाजवादी और किसान नेता थे। एक साधारण किसान परिवार में जन्म लेने वाले मुलायम सिंह ने अपना राजनीतिक जीवन उत्तर प्रदेश में विधायक के रूप में शुरू किया। बहुत कम समय में ही मुलायम सिंह का प्रभाव पूरे उत्तर प्रदेश में नज़र आने लगा। मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग समाज का सामाजिक स्तर को ऊपर करने में महत्वपूर्ण कार्य किया। सामाजिक चेतना के कारण उत्तर प्रदेश की राजनीति में अन्य पिछड़ा वर्ग का महत्वपूर्ण स्थान हैं।

मुलायम सिंह यादव की राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्तों में अटूट आस्था रही। भारतीय भाषाओं, भारतीय संस्कृति और शोषित पीड़ित वर्गों के हितों के लिए उनका अनवरत संघर्ष जारी रहा। उन्होंने ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, जर्मनी, स्विटजरलैण्ड, पोलैंड और नेपाल आदि देशों की भी यात्राएँ की थी। कहा जाता था कि मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश की किसी भी जनसभा में कम से कम पचास लोगों को नाम लेकर मंच पर बुला सकते हैं।

मुलायम सिंह मूलतः एक शिक्षक थे किन्तु शिक्षण कार्य छोड़कर वे राजनीति में आये थे। तथा समाजवादी पार्टी बनायी थी। मुलायम सिंह यादव का जन्म 22 नवम्बर 1939 को इटावा जिले के सैफई गाँव में मूर्ति देवी व सुघर सिंह यादव के किसान परिवार में हुआ था। मुलायम सिंह यादव अपने पाँच भाई-बहनों में रतनसिंह यादव से छोटे व अभयराम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव, राजपाल सिंह और कमला देवी से बड़े थे। प्रोफेसर रामगोपाल यादव इनके चचेरे भाई हैं। पिता सुघर सिंह उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे किन्तु पहलवानी में अपने राजनीतिक गुरु चौधरी नत्थूसिंह को मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती-प्रतियोगिता में प्रभावित करने के पश्चात उन्होंने नत्थूसिंह के परम्परागत विधान सभा क्षेत्र जसवन्त नगर से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था।

राजनीति में आने से पूर्व मुलायम सिंह यादव आगरा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर (एम०ए०) और बी० टी० करने के उपरान्त इन्टर कालेज में प्रवक्ता नियुक्त हुए और सक्रिय राजनीति में रहते हुए नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था।

मुलायम सिंह समाजवादी नेता रामसेवक यादव के प्रमुख अनुयायी थे तथा इन्हीं के आशीर्वाद से मुलायम सिंह 1967 में पहली बार विधान सभा के सदस्य चुने गये और मन्त्री बने। 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी बनाई। वे तीन बार क्रमशः 5 दिसम्बर 1989 से 24 जनवरी 1991 तक, 5 दिसम्बर 1993 से 3 जून 1996 तक और 29 अगस्त 2003 से 11 मई 2007 तक उत्तर प्रदेश के मुख्य मन्त्री रहे। इसके अतिरिक्त वे केन्द्र सरकार में रक्षा मन्त्री भी रहे।

मुलायम सिंह यादव जसवंत नगर और फिर इटावा की सहकारी बैंक के निदेशक चुने गए थे। विधायक का चुनाव भी ‘सोशलिस्ट पार्टी’ और फिर ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ से लड़ा था। इसमें उन्होंने विजय भी प्राप्त की। उन्होंने स्कूल के अध्यापन कार्य से इस्तीफा दे दिया था। पहली बार मंत्री बनने के लिए मुलायम सिंह यादव को 1977 तक इंतज़ार करना पड़ा, जब कांग्रेस विरोधी लहर में उत्तर प्रदेश में भी जनता सरकार बनी थी। 1980 में भी कांग्रेस की सरकार में वे राज्य मंत्री रहे और फिर चौधरी चरण सिंह के लोकदल के अध्यक्ष बने और विधान सभा चुनाव हार गए। चौधरी साहब ने विधान परिषद में मनोनीत करवाया, जहाँ वे प्रतिपक्ष के नेता भी रहे।

केंद्रीय राजनीति में मुलायम सिंह का प्रवेश 1996 में हुआ, जब काँग्रेस पार्टी को हरा कर संयुक्त मोर्चा ने सरकार बनाई। एच. डी. देवेगौडा के नेतृत्व वाली इस सरकार में वह रक्षामंत्री बनाए गए थे, किंतु यह सरकार भी ज़्यादा दिन चल नहीं पाई और तीन साल में भारत को दो प्रधानमंत्री देने के बाद सत्ता से बाहर हो गई।

मुलायम सिंह पर कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। इनमे पहला नाम “मुलायम सिंह यादव- चिन्तन और विचार” का है जिसे अशोक कुमार शर्मा ने सम्पादित किया था। इसके अतिरिक्त राम सिंह तथा अंशुमान यादव द्वारा लिखी गयी “मुलायम सिंह: ए पोलिटिकल बायोग्राफी” अब उनकी प्रमाणिक जीवनी है। लखनऊ की पत्रकार डॉ नूतन ठाकुर ने भी मुलायम सिंह के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक महत्व को रेखांकित करते हुए एक पुस्तक लिखने का कार्य किया है।

बहरहाल राजनीति ऐसी काजल की कोठरी है जहाँ कोई आरोप प्रत्यारोप से बचा नहीं है। आज हमारे बीच मुलायम सिंह यादव नहीं है। उनके बहुत से कार्य और विचार ऐसे रहे जो उन्हें भारतीय राजनीति का पुरोधा साबित करने के लिए पर्याप्त हैं। भारतीय राजनीति के इतिहास में इनकी सियासी पहुँच और ताक़त की उपेक्षा नहीं की जा सकेगी। उनके इर्द गिर्द के मजबूत साथियों और दूसरी पंक्ति के नेताओं ने उन्हें हमेशा मजबूत आधार प्रदान किया और ‘नेताजी’ ने अपनी सर्वश्रेष्ठ हासिल किया।

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