क्या कांग्रेस नफरत की राजनीति बदल पायेगी?

समाचार

धनंजय कुमार
दस
मार्च में अब ज्यादा दिन नहीं हैं ! यूपी में बीजेपी की हार का असर कांग्रेस और बिहार दोनों पर होगा !
कांग्रेस बीजेपी के विकल्प के तौर पर देखी जाने लगेगी, सवर्णवादी जो पूरी तरह से आज बीजेपी के साथ हैं, ओबीसी की राजनीति के मजबूत होने की स्थिति में कांग्रेस की ओर रुख करेंगे, क्योंकि कांग्रेस बीजेपी की तरह खुलेआम सवर्णवादी राजनीति नहीं करती। हालांकि कांग्रेस के शासन काल में भी सवर्ण ही सत्ता का सुख भोगते रहे, लेकिन यूं अगड़ा पिछड़ा का टकराव कांग्रेस ही रोक सकती है।

हालांकि वीपी सिंह के आरक्षण लागू करने की वजह से अगड़ा बनाम पिछड़ा मुखर हुआ था, और बीजेपी ही थी, जिसने हिंदुत्ववाद के नाम पर अगड़े पिछड़े को आमने सामने से हटाकर मुसलमान को दुश्मन के तौर पर प्रजेंट कर अगड़ा-पिछड़ा के झगड़े पर पानी डालने की कोशिश थी, लेकिन पूर्ण बहुमत के बाद बीजेपी ने साबित किया कि उसकी असली चिंता हिंदूवाद नहीं सवर्णवाद है। इसलिए पिछड़ों को आरक्षण से मिलने वाले लाभ को सीमित किया और अगड़ों को भी आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत का आरक्षण दिया।

इस तरह आरक्षण का आधार जो कि पहले जातीय था, उसे आर्थिक भी बना दिया। और उससे भी खतरनाक ये कि आरक्षण को खत्म करने का नया दांव चल दिया। वो दांव है निजीकरण। जब सरकारी कंपनियां प्राइवेट हो जाएंगी तो आरक्षण का लाभ कैसे मिलेगा? क्या प्राइवेट कंपनियों में आरक्षण की नीति को प्रभावी बना पाएगी सरकार? जवाब है नहीं।

आरक्षण को उठाने का एक मार्ग हो सकता था, सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की गुणवत्ता और संख्या में उत्तरोत्तर विस्तार, लेकिन उल्टा उन्हें डिफंक्ट करने का प्रयास किया गया। टीचरों और अच्छे टीचरों की कमी लगातार बढ़ी। करियर बनाने को उद्दत युवाओं के सामने प्राइवेट स्कूल-कॉलेज के विकल्प ला दिए गए।

हालांकि यह भी सच है कि इस स्थिति को मनमोहन राज में फूलने और फलने का मौका मिला। मोदी सरकार ने उस मौके को अपने एजेंडे के लिए इन कैश किया और स्थिति ऐसी बना दी गई कि प्राइवेट और सरकारी मेडिकल सीट कुल मिलाकर 90 हजार के करीब थी और नीट में 8 लाख के करीब विद्यार्थी पास कर दिए गए। जाहिर है प्राइवेट को कमाई देना और जो आर्थिक रूप से सक्षम है, पढे, बाकी भाड़ में जाए की नीति अपनाई गई।

कांग्रेस से उम्मीद है पहले की गलती से वो सबक लेगी। और सीधे सीधे मनमोहन की आर्थिक नीति को लागू करने के बजाय नेहरू और मनमोहन दोनों की आर्थिक नीतियों के बीच समन्वय स्थापित करने के कोशिश करेगी।

अब हम राजनीतिक सवाल पर आते हैं। सवर्णवादियों को जब अहसास होगा कि बीजेपी पिछड़ों के सामने एक्सपोज हो गई, और अब उसके सत्ता में आने की संभावना नहीं है, तो वे कांग्रेस के पहलू में वापस जायेगे। तेजस्वी और अखिलेश को सवर्णवादी नेता मानने से रहे। ऐसे में सवर्णवादियों के पास कॉंग्रेस विकल्प है। कांग्रेस ने भी जैसे उत्तर प्रदेश में सपा से दूर रही, वैसे ही कांग्रेस बिहार में भी राजद से दूर होती दिखेगी। इसलिए पिछड़ों के लिए भी ये जरूरी है कि आगे बनाते समीकरण पर नजर रखे। इसीलिए अखिलेश ने संकीर्ण जातिवाद से निकल वृहत्तर जातिवाद को चुना है। लेकिन दिल्ली में क्या होगा? अखिलेश दिल्ली में बीजेपी को हटा नहीं सकते, यह योग्यता कांग्रेस में ही है, ऐसे में मुस्लिम वोट लोकसभा में सपा से छिटकेंगे, तो सवर्ण वोट बीजेपी से।

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